चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में गरमाई बहस: क्या बड़ी बेंच में जाएगा मामला? जानिए कोर्ट में क्या-क्या हुआ

देश में चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों घमासान मचा हुआ है। गुरुवार (30 जुलाई) को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच के सामने इस हाई-प्रोफाइल मामले पर लंबी सुनवाई हुई। सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए, जिन्होंने इस पूरे मामले को बड़ी बेंच में ट्रांसफर करने की जोर-दार मांग की। वहीं, याचिकाकर्ताओं की तरफ से सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए गए। आइए जानते हैं कि इस सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में क्या-क्या हुआ और इसके क्या मायने हैं।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का विवाद क्या है?
साल 2023 में डॉ. जया गुप्ता और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसमें मुख्य रूप से इस बात को चुनौती दी गई है कि सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जो नया कानून बनाया है, उसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर रखा गया है। एडीआर की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है, जबकि सरकार अपनी दलीलों पर कायम है।
सरकार इस केस को बड़ी बेंच में क्यों भेजना चाहती है?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले को बड़ी बेंच (5 जजों की बेंच) में भेजने के लिए कई मुख्य तर्क दिए:
-
संसद का विधाई अधिकार: एसजी मेहता ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 (2) और 327 के तहत संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का पूरा अधिकार है। यह एक बड़ा संवैधानिक मामला है, जिसे सिर्फ 5 जजों की बेंच ही सुन सकती है।
-
प्रधानमंत्री की पवित्रता और कार्यपालिका की जवाबदेही: उन्होंने दलील दी कि प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख हैं और वे विधायिका के प्रति जवाबदेह हैं। प्रधानमंत्री अगर किसी की नियुक्ति करते हैं, तो उनकी नीयत और पवित्रता पर शक नहीं किया जाना चाहिए।
-
जजों द्वारा जजों की नियुक्ति का तर्क: एसजी मेहता ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में 'जज ही जज को चुनते हैं' और पूरा देश इस व्यवस्था पर विश्वास करता है, इसलिए कार्यपालिका के अधिकार पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।
-
2023 के अनूप वर्णवाल केस का हवाला: सरकार ने कोर्ट को बताया कि अनूप वर्णवाल केस की सुनवाई 5 जजों की बेंच ने की थी, जिसमें यह कहा गया था कि संसद को इस पर कानून बनाने का अधिकार है। इसलिए यदि इस मामले में किसी उल्लंघन की बात है, तो वह भी बड़ी बेंच के सामने ही जानी चाहिए।
जस्टिस दीपांकर दत्ता की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब एसजी तुषार मेहता ने 'जज द्वारा जज के चुने जाने' का हवाला दिया, तो उस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने काफी तल्ख टिप्पणी की। जस्टिस दत्ता ने पलटवार करते हुए कहा, "आप यह बता सकते हैं कि देश में कितने दागी मंत्री हैं?" कोर्ट ने यह साफ संकेत दिया कि पारदर्शिता और जवाबदेही के पैमाने हर संवैधानिक पद पर लागू होने चाहिए।
2029 के चुनाव का एंगल और वकीलों के सवाल
याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया ने सरकार की टाइमिंग पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि लगातार 28 दिनों की सुनवाई के बाद अब अचानक केस ट्रांसफर की मांग करना सरकार की गलत मंशा को दर्शाता है।
इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक एंगल 2029 के लोकसभा चुनाव का भी है। मार्च 2029 में प्रस्तावित आम चुनाव से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (जनवरी 2029) और चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू (जुलाई 2028) रिटायर हो रहे हैं। अगर यह मामला बड़ी बेंच को भेजा जाता है, तो सुनवाई में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में सरकार मौजूदा प्रक्रिया के तहत ही नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर सकती है।
अब आगे क्या होगा?
सुनवाई के अंत में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक बेहद अहम और पुरानी कहावत को दोहराते हुए कहा— "न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।" इसी तर्ज पर कोर्ट ने कहा कि पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को अपने लिखित हलफनामे (Written Submissions) दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद अदालत इस पर अपना फैसला सुनाएगी।