अजरबैजान के स्कूलों में हिजाब बैन पर तुर्की के बाद ईरान के कट्टरपंथी भड़के

मध्य एशिया और मध्य पूर्व के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर तनाव चरम पर पहुंच गया है। अजरबैजान सरकार द्वारा देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं के हिजाब और धार्मिक पोशाक पहनने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया है। इस फैसले के सामने आते ही मुस्लिम बहुल पड़ोसी देशों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। शुरुआत में तुर्की के कुछ धार्मिक संगठनों ने इस कदम का विरोध किया था, लेकिन अब ईरान के उग्रवादी और कट्टरपंथी गुटों ने इस विवाद में कूदकर माहौल को और भी अधिक गरमा दिया है। ईरान के वरिष्ठ धर्मगुरुओं और कट्टरपंथी नेताओं ने अजरबैजान के इस फैसले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे एक 'शैतानी कदम' करार दिया है और इसे इस्लामिक संस्कृति पर सीधा हमला बताया है।
अजरबैजान सरकार का धर्मनिरपेक्षता की ओर बड़ा कदम
अजरबैजान लंबे समय से खुद को एक आधुनिक, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है। देश के शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में एक समान ड्रेस कोड लागू करने का आदेश जारी किया है। सरकार का तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों का माहौल पूरी तरह से तटस्थ होना चाहिए, जहां किसी भी धर्म, जाति या विशेषाधिकार का प्रदर्शन न हो। अधिकारियों का मानना है कि बालिकाओं के लिए स्कूल यूनिफॉर्म में हिजाब या सिर ढकने वाले कपड़ों को शामिल न करने से सभी छात्रों के बीच समानता की भावना विकसित होगी। हालांकि, यह फैसला घरेलू स्तर पर रूढ़िवादी परिवारों के बीच असंतोष का कारण बना ही था कि अब यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।
तुर्की की शुरुआती प्रतिक्रिया और ईरान का उग्र रुख
जब अजरबैजान ने इस प्रतिबंध की घोषणा की, तो सबसे पहले तुर्की के कंजर्वेटिव और इस्लामिक हलकों में इसकी सुगबुगाहट शुरू हुई। तुर्की के कई धार्मिक समूहों ने इसे मुस्लिम समुदाय की भावनाओं के खिलाफ बताया। हालांकि, तुर्की सरकार ने अजरबैजान के साथ अपने रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों को देखते हुए आधिकारिक तौर पर काफी नपा-तुला रुख अपनाया। लेकिन ईरान के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग रही। ईरान के कट्टरपंथी वर्ग ने इस फैसले को सीधे तौर पर पश्चिमी देशों और इजरायल के प्रभाव में लिया गया निर्णय करार दिया है। तेहरान और अन्य प्रमुख ईरानी शहरों में धार्मिक प्रचारकों ने अजरबैजान के राष्ट्रपति और उनकी सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी शुरू कर दी है, जिससे दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद भू-राजनीतिक दरार और चौड़ी हो गई है।
'शैतानी कदम' कहकर ईरानी धर्मगुरुओं ने बोला हमला
ईरान के शीर्ष कट्टरपंथी नेताओं और धार्मिक सभाओं ने अजरबैजान के इस कानून के खिलाफ फतवे जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है। ईरानी मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित बयानों में कहा गया है कि किसी भी मुस्लिम देश में बालिकाओं को हिजाब पहनने से रोकना ईश्वर के आदेशों का उल्लंघन है और यह एक 'शैतानी कदम' है। ईरानी विश्लेषकों का दावा है कि बाकू की सरकार अपने ही देश के बहुसंख्यक शिया नागरिकों की धार्मिक पहचान को मिटाने की साजिश रच रही है। ईरान के इस उग्र रुख के पीछे केवल धार्मिक कारण ही नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने की उसकी पुरानी चाहत भी है, जिसे अजरबैजान की पश्चिमी-समर्थक और धर्मनिरपेक्ष नीतियां लगातार चुनौती दे रही हैं।
सीमा पार कूटनीतिक तनाव और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर
अजरबैजान और ईरान के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों से काफी संवेदनशील रहे हैं। अजरबैजान की इजरायल के साथ बढ़ती नजदीकी और रणनीतिक साझेदारी हमेशा से ईरान के लिए आंख की किरकिरी बनी रही है। अब हिजाब बैन का यह नया मुद्दा दोनों देशों के बीच कूटनीतिक कड़वाहट को एक नए स्तर पर ले आया है। अजरबैजान के गृह मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों ने देश के भीतर किसी भी प्रकार के ईरान-समर्थित विरोध प्रदर्शन या असामाजिक गतिविधियों से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। बाकू प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि अजरबैजान एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने आंतरिक मामलों व शिक्षा नीति में किसी भी बाहरी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा।
मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता पर छिड़ी नई बहस
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के बीच भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां मानवाधिकार समूहों का एक वर्ग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकार के हनन के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों का मानना है कि कट्टरपंथ को रोकने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों को धार्मिक प्रतीकों से मुक्त रखना बेहद जरूरी है। यूरोपीय देशों और संयुक्त राष्ट्र की नजरें भी इस बात पर टिकी हैं कि अजरबैजान सरकार धार्मिक स्वतंत्रता की मांगों और अपनी धर्मनिरपेक्ष नीतियों के बीच कैसे संतुलन बनाए रखती है।
भविष्य की राह और जनमानस पर प्रभाव
अजरबैजान के इस साहसिक लेकिन विवादित फैसले का असर आने वाले समय में मध्य एशिया के अन्य देशों पर भी पड़ सकता है। जहां एक ओर देश की युवा पीढ़ी और आधुनिक सोच रखने वाले नागरिक सरकार के इस कदम को प्रगतिशील मान रहे हैं, वहीं ग्रामीण और पारंपरिक रूप से धार्मिक परिवारों में इसको लेकर नाराजगी बरकरार है। तुर्की और ईरान जैसे शक्तिशाली पड़ोसी देशों के दबाव के बावजूद अजरबैजान सरकार अपने फैसले पर अडिग नज़र आ रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बाकू प्रशासन अंतरराष्ट्रीय दबाव, पड़ोसी देशों की बयानबाज़ी और घरेलू जनभावनाओं के बीच अपनी नीतियों को किस तरह आगे बढ़ाता है।