धर्म

आज का पंचांग 3 अक्टूबर: जितिया व्रत, महालक्ष्मी व्रत समापन और अष्टमी श्राद्ध का दुर्लभ महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त व राहुकाल

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत फलदायी मानी जाती है। 3 अक्टूबर को पंचांगीय गणना के अनुसार एक साथ तीन बड़े धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हो रहे हैं। आज संतान की लंबी उम्र और आरोग्य की कामना के लिए रखा जाने वाला निर्जला 'जीवित्पुत्रिका' (जितिया) व्रत है। इसके साथ ही पिछले 16 दिनों से चले आ रहे 'महालक्ष्मी व्रत' का विधि-विधान से उद्यापन और समापन किया जा रहा है। वहीं पितृ पक्ष के अंतर्गत आज मातृ नवमी से पूर्व 'अष्टमी श्राद्ध' का तर्पण और पिंडदान भी किया जाएगा। इसके अलावा आज कालाष्टमी और मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी श्रद्धाभाव के साथ मनाया जा रहा है। इस प्रकार एक ही दिन देव, पितृ और मातृ शक्ति की आराधना का दुर्लभ संयोग बन रहा है।

तिथि, संवत और नक्षत्र गणना

आज के दिन की शुरुआत आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के साथ हुई, जो सुबह 07:59 बजे समाप्त हो रही है। इसके उपरांत अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी, जो अगले दिन 4 अक्टूबर की सुबह 05:51 बजे तक रहेगी।

  • विक्रम संवत: 2083 (सिद्धार्थी)

  • शक संवत: 1948 (पराभव)

  • चन्द्र मास: आश्विन (पूर्णिमान्त)

  • नक्षत्र: आज पुनर्वसु नक्षत्र का प्रभाव पूरे दिन बना रहेगा।

  • योग: दिन की शुरुआत वरीयान योग से हुई है, जो दोपहर 03:21 बजे तक रहेगा। इसके बाद परिघ योग प्रारंभ होगा।

  • करण: सुबह 08:00 बजे तक बव करण रहेगा, तत्पश्चात बालव करण शाम 06:55 बजे तक और फिर कौलव करण प्रभावी रहेगा।

  • सूर्योदय व सूर्यास्त: सुबह 06:15 बजे सूर्योदय और शाम 06:05 बजे सूर्यास्त होगा।

  • चन्द्रोदय: रात्रि 11:32 बजे चंद्र दर्शन होगा।

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत और पूजन विधि

जितिया व्रत उत्तर भारत, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में माताओं द्वारा अपनी संतान की मंगल कामना और दीर्घायु के लिए पूरी श्रद्धा के साथ रखा जाता है। यह व्रत अत्यंत कठिन और 24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला रखा जाता है। आज के दिन माताएं भगवान जीमूतवाहन की कुशा से प्रतिमा बनाकर पूजा-अर्चना करती हैं। साथ ही मिट्टी और गोबर से चील और सियारिन की आकृतियां बनाकर सिंदूर का टीका लगाया जाता है और पारंपरिक कथा का श्रवण किया जाता है। इस व्रत का पारण कल यानी 4 अक्टूबर की सुबह सूर्योदय के बाद सात्विक अन्न-जल ग्रहण करके किया जाएगा।

16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर आश्विन कृष्ण अष्टमी तक चलने वाले 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का आज विधिवत समापन हो रहा है। इस दिन व्रती 16 गांठों वाले रक्षा सूत्र (डोरे) की पूजा करके उसे विसर्जित करते हैं या धारण करते हैं। मान्यता है कि आज के दिन श्री सूक्त और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है और दरिद्रता का नाश होता है। उद्यापन के दौरान 16 सुहागिन महिलाओं को फल, मिष्ठान, श्रृंगार सामग्री और वस्त्र का दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है।

पितृ पक्ष अष्टमी श्राद्ध का महत्व और कुतुप मुहूर्त

पितृ पक्ष में पड़ने वाली अष्टमी तिथि को उन पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी माह की अष्टमी तिथि को हुआ हो। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध कर्म हमेशा मध्याह्न काल में ही संपन्न करना चाहिए।

  • कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:46 से दोपहर 12:34 बजे तक (श्राद्ध कर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ)

  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:34 से दोपहर 01:21 बजे तक

  • अपराह्न काल: दोपहर 01:21 से दोपहर 03:40 बजे तक

    इस दौरान पंचबलि यानी गाय, श्वान, कौवे, देव और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकालना अनिवार्य माना गया है, जिससे पितरों की आत्मा को परम तृप्ति मिलती है।

आज के शुभ और अशुभ मुहूर्त का समय

किसी भी मांगलिक या नए कार्य को आरंभ करने से पहले शुभ और अशुभ समय का ध्यान रखना आवश्यक होता है:

  • अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:46 से दोपहर 12:34 बजे तक (सर्वश्रेष्ठ शुभ समय)

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:08 से दोपहर 02:56 बजे तक

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:38 से सुबह 05:26 बजे तक

  • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:05 से शाम 06:29 बजे तक

  • अमृत काल: दोपहर 04:05 से शाम 05:35 बजे तक

  • राहुकाल: सुबह 09:12 से सुबह 10:41 बजे तक (इस समय शुभ कार्य वर्जित हैं)

  • यमगण्ड: दोपहर 01:39 से दोपहर 03:07 बजे तक

  • दिशा शूल: आज पूर्व दिशा में दिशा शूल रहेगा। यदि पूर्व दिशा की यात्रा अनिवार्य हो, तो अदरक या घी खाकर ही प्रस्थान करें।

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