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आलीशान फ्लैट्स की चमक फीकी पड़ते ही आम खरीदारों के आगे झुके बड़े बिल्डर्स: ₹2.5 करोड़ से महंगे घरों की सप्लाई 8% घटी, अब मिड-सेगमेंट और बजट हाउसिंग पर लौटेगा फोकस

कोरोना महामारी के बाद से देश के रियल एस्टेट बाजार में जिस बेतहाशा रफ्तार से लग्जरी और अल्ट्रा-लग्जरी आशियानों की बाढ़ आई हुई थी, अब उस अनियंत्रित तेजी पर ब्रेक लगता दिखाई दे रहा है। पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान लगभग हर प्रमुख बिल्डर केवल अमीर उद्योगपतियों, एनआरआई और हाई-नेट-वर्थ इन्वेस्टर्स (HNI) को लुभाने के लिए 2.5 करोड़, 5 करोड़ और 10 करोड़ रुपये वाले विशाल पेंटहाउस व क्लब-क्लास फ्लैट्स लॉन्च करने की होड़ में लगा हुआ था। सामान्य नौकरीपेशा और मध्यम वर्ग इस दौरान आसमान छूती कीमतों के चलते बाजार से लगभग गायब सा हो गया था। हालांकि, अब रियल एस्टेट बाजार के ताजा जमीनी आंकड़े बता रहे हैं कि अमीरों की जेब पर टिके इस बुलबुले की हवा निकलने लगी है। प्रमुख प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्मों के ताजा तिमाही आंकड़ों के अनुसार, देश के शीर्ष सात महानगरों में ₹2.5 करोड़ और उससे अधिक कीमत वाले प्रीमियम घरों की नई सप्लाई में 8 प्रतिशत तक की तेज गिरावट दर्ज की गई है। लग्जरी सेगमेंट में मांग के संतृप्त (सैचुरेशन) होने और इन्वेंट्री के अटकने के बाद अब देश भर के दिग्गज रियल एस्टेट डेवलपर्स को एक बार फिर अपनी पुरानी जमीन यानी आम और मध्यम वर्गीय घर खरीदारों की ओर रुख करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

लग्जरी हाउसिंग बूम पर लगा ब्रेक: 2.5 करोड़ से महंगे फ्लैट्स की सप्लाई में 8% की गिरावट

रियल्टी क्षेत्र की प्रमुख रिसर्च एजेंसियों के विश्लेषण के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की ताजा तिमाहियों में दिल्ली-एनसीआर, मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR), बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और कोलकाता में नए आवासीय लॉन्च के रुझान में नाटकीय बदलाव आया है। जहां पिछले साल तक कुल नए प्रोजेक्ट्स में प्रीमियम और लग्जरी श्रेणी की हिस्सेदारी लगभग 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, वहीं अब इस श्रेणी में डेवलपर्स ने अपने नए चरण और लॉन्चिंग रोक दी है। ₹2.5 करोड़ से अधिक मूल्य वर्ग वाले प्रीमियम फ्लैट्स की नई आपूर्ति में आई 8% की गिरावट कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि महानगरों में सुपर-रिच खरीदारों का वह सीमित समूह अब लगभग पूरी तरह खरीदारी कर चुका है जो अंधाधुंध कीमतों पर प्रीमियम प्रॉपर्टीज खरीद रहा था। नतीजतन, करोड़ों रुपये मूल्य वाले अनसोल्ड यानी बिना बिके फ्लैट्स की इन्वेंट्री का ढेर कई बड़े बिल्डरों की बैलेंस शीट पर भारी वित्तीय दबाव बनाने लगा है।

क्यों अचानक फीकी पड़ी आलीशान आशियानों की चमक?

इस अप्रत्याशित सुस्ती के पीछे कई गहरे आर्थिक और व्यावहारिक कारण काम कर रहे हैं। पहला बड़ा कारण निवेशकों की थकान (Investor Fatigue) है। पिछले दो सालों में गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड, मुंबई के वर्ली-बांद्रा, और बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड जैसे इलाकों में फ्लैट्स के दाम 40 से 70 फीसदी तक बढ़ा दिए गए थे। इतनी ऊंची कीमतों पर प्रॉपर्टी खरीदने वाले सटोरिया निवेशकों को अब रेंटल यील्ड (किराया मुनाफा) महज 2.5 से 3 प्रतिशत ही मिल पा रहा है, जो बैंकों की साधारण ब्याज दर से भी आधा है। दूसरा कारण यह है कि अल्ट्रा-लग्जरी सेगमेंट में सेकेंडरी मार्केट (रीसेल) पूरी तरह सुस्त पड़ चुका है। जिन अमीर खरीदारों ने दो साल पहले निवेश के मकसद से 3 से 4 करोड़ के फ्लैट्स बुक किए थे, उन्हें अब मुनाफे पर नए खरीदार नहीं मिल रहे हैं। इसके अलावा, वैश्विक आईटी सेक्टर में छंटनी और स्टार्टअप फंडिंग में नरमी के कारण उच्च वेतनभोगी तकनीकी पेशेवरों ने भी भारी-भरकम ईएमआई वाले महंगे सौदों से हाथ खींच लिए हैं।

आम और मध्यम वर्गीय खरीदारों के आगे क्यों झुकने को मजबूर हुए डेवलपर्स?

रियल एस्टेट का इतिहास गवाह है कि जब-जब बाजार में सट्टेबाजी का दौर थमता है, तब-तब डेवलपर्स को अपनी जीवनरेखा बचाने के लिए वास्तविक उपभोक्ताओं (End-Users) यानी देश के वेतनभोगी मध्यम वर्ग के पास ही वापस आना पड़ता है। भारत की विशाल आबादी में वास्तविक आवास की जरूरत 45 लाख रुपये से लेकर 1.2 करोड़ रुपये के बजट वाले घरों में है। बिल्डरों को अब समझ आ चुका है कि 5 करोड़ का एक फ्लैट बेचने में महीनों का समय और भारी मार्केटिंग खर्च लगता है, जबकि सही लोकेशन पर 60 से 90 लाख रुपये के 2BHK और 3BHK फ्लैट्स कुछ ही हफ्तों में बिक जाते हैं। नकदी के प्रवाह (Cash Flow) को नियमित रखने और बैंकों के भारी कर्ज के ब्याज से बचने के लिए अब डीएलएफ, गोदरेज प्रॉपर्टीज, प्रेस्टीज ग्रुप और सिग्नेचर ग्लोबल जैसे नामी डेवलपर्स ने भी अपनी आगामी पाइपलाइन में मिड-इनकम और कॉम्पैक्ट लग्जरी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है।

दिल्ली-एनसीआर से लेकर मुंबई और बेंगलुरु तक: प्रमुख शहरों का बदला मिजाज

यदि भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें, तो इस बदलाव का सबसे मुखर असर दिल्ली-एनसीआर में देखा जा रहा है। गुरुग्राम के द्वारका एक्सप्रेसवे और एसपीआर (सदरर्न पेरिफेरल रोड) पर जहां पिछले साल तक केवल ₹3 करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट्स आ रहे थे, वहीं अब डेवलपर्स सोहना रोड और न्यू गुरुग्राम में ₹80 लाख से ₹1.5 करोड़ की रेंज में नए आवासीय चरण लाने की तैयारी कर रहे हैं। ग्रेटर नोएडा वेस्ट (नोएडा एक्सटेंशन) और यमुना एक्सप्रेसवे पर मध्यम वर्ग के खरीदारों की जबर्दस्त आवाजाही से बिक्री के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं। मुंबई और ठाणे के उपनगरीय इलाकों में भी डेवलपर्स ने फ्लैट्स के सुपर बिल्ट-अप एरिया को थोड़ा सीमित करके ऐसे कॉम्पैक्ट 2BHK डिजाइन किए हैं जिनकी टिकट साइज आम परिवारों के बजट यानी ₹1.2 करोड़ के भीतर बैठ सके। वहीं दक्षिण भारत के आईटी हब बेंगलुरु और हैदराबाद में भी अंधाधुंध लग्जरी विला प्रोजेक्ट्स के बजाय आईटी कॉरिडोर के आसपास 70 से 95 लाख रुपये वाले स्मार्ट होम्स की नई खेप लॉन्च की जा रही है।

त्योहारी और आगामी सीजन में ऑफर्स की वापसी: नो-ईएमआई और फ्लेक्सिबल पेमेंट प्लान

लग्जरी सेगमेंट में आई इस सुस्ती ने खरीदारों के पक्ष में मोलभाव (Bargaining Power) की ताकत लौटा दी है। जो बिल्डर्स कुछ महीने पहले खरीदारों से सीधे मुंह बात नहीं करते थे और प्रीमियम के नाम पर मनमाना एग्रीमेंट करते थे, वे अब ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई रियायतों की घोषणा कर रहे हैं। बाजार में एक बार फिर '10:90' और '20:80' जैसे सबवेंशन और फ्लेक्सिबल पेमेंट प्लान वापस आ रहे हैं, जिसमें बुकिंग के समय महज 10 से 20 प्रतिशत राशि देनी होती है और बाकी भुगतान फ्लैट का कब्जा (Possession) मिलने के समय करना पड़ता है। इसके साथ ही, कई डेवलपर्स द्वारा फ्री कार पार्किंग, मॉड्यूलर किचन, क्लब मेंबरशिप की फीस माफी और होम लोन पर ब्याज दरों में आंशिक सब्सिडी जैसे अप्रत्यक्ष डिस्काउंट्स भी दिए जा रहे हैं, जिससे कुल सौदे में आम खरीदार को 5 से 8 लाख रुपये तक की सीधी बचत हो रही है।

घर खरीदारों के लिए सुनहरा मौका: क्या अब प्रॉपर्टी में दांव लगाने का सही समय है?

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि आप अपने रहने के लिए आशियाना तलाश रहे हैं, तो आगामी छह से बारह महीने घर खरीदने के लिहाज से बेहद अनुकूल साबित हो सकते हैं। एक तरफ जहां लग्जरी सेगमेंट की कीमतों में ठहराव आने से बिल्डरों के मुनाफे का मार्जिन सामान्य स्तर पर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मांग को थामने के लिए मिड-सेगमेंट में वाजिब दरों पर बेहतर सुविधाएं दी जा रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञों की सलाह है कि खरीदार किसी भी प्रोजेक्ट में पैसा लगाने से पहले राज्य के रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) की वेबसाइट पर जाकर प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन नंबर, जमीन का मालिकाना हक और पजेशन की आधिकारिक तारीख की बारीकी से जांच करें। केवल कागजी ब्रोशर और आकर्षक ऑफर्स के बहकावे में आने के बजाय उन डेवलपर्स को प्राथमिकता दें जिनका पिछला ट्रैक रिकॉर्ड समय पर डिलीवरी देने का रहा है, ताकि आपकी गाढ़ी कमाई सुरक्षित रहे और समय पर आपके अपने घर का सपना सच हो सके।

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