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इंडियन आइडल 1 विजेता अभिजीत सावंत का 21 साल बाद छलका दर्द, शुरुआती शोहरत और असफलता के दबाव पर किया बड़ा खुलासा

साल 2005 भारतीय टेलीविजन और संगीत उद्योग के इतिहास में एक ऐसा मोड़ था जिसने रियलिटी शोज की पूरी परिभाषा बदलकर रख दी थी। इसी वर्ष सोनी टीवी पर प्रसारित हुए पहले 'इंडियन आइडल' के विजेता बनकर मुंबई के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले अभिजीत सावंत रातों-रात पूरे देश के चहेते स्टार बन गए थे। उनके डेब्यू ट्रैक 'मोहब्बतें लुटाऊंगा' और 'लफ्जों में कह ना सकूं' ने देश के हर म्यूजिक चार्ट पर शीर्ष स्थान हासिल किया और वे घर-घर में एक घरेलू नाम बन गए। उस समय देश में सोशल मीडिया या यूट्यूब का दौर नहीं था, केवल टीवी और कैसेट्स-सीडी के माध्यम से किसी गायक का इस स्तर पर पहुंचना अभूतपूर्व माना जाता था।

अभिजीत सावंत को मिली वह असाधारण लोकप्रियता अपने साथ एक भारी उम्मीदों का बोझ भी लेकर आई थी। लोग उन्हें अगला बड़ा बॉलीवुड प्लेबैक सुपरस्टार मान रहे थे, और हर तरफ केवल उन्हीं के नाम की चर्चा थी। लेकिन ठीक उसी वर्ष 2005 में, एक और युवा गायक छोटे पर्दे के रियलिटी शो 'फेम गुरुकुल' के मंच पर अपनी किस्मत आजमा रहा था, जिसका नाम था अरिजीत सिंह। हालांकि उस समय अरिजीत शो जीतने में असफल रहे थे और प्रतियोगिता के शीर्ष दौर से बाहर हो गए थे। उस दौर में किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि आगे चलकर दोनों कलाकारों के करियर की दिशा पूरी तरह बदल जाएगी।

अरिजीत सिंह का एक दशक का लंबा संघर्ष और पर्दे के पीछे की खामोश तपस्या

हाल ही में 'फिल्मज्ञान' के साथ एक विशेष साक्षात्कार में अभिजीत सावंत ने अपने और अरिजीत सिंह के करियर के उतार-चढ़ाव पर बेहद संजीदगी और बेबाकी से बात की। अभिजीत ने खुलासा किया कि साल 2005 के बाद से अरिजीत सिंह मुख्यधारा की चकाचौंध और मीडिया की नजरों से लगभग एक पूरे दशक यानी 10 सालों तक पूरी तरह दूर रहे। उन्होंने इस पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि इसे किसी की खुशकिस्मती कहें या बदकिस्मती, लेकिन अरिजीत को वह समय मिला जिसने उन्हें एक परिपक्व संगीतकार के रूप में ढाला। शो से बाहर होने के बाद अरिजीत ने तुरंत गायक बनने की जल्दबाजी नहीं दिखाई बल्कि बुनियादी संगीत निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया।

उस लंबे दशक के दौरान अरिजीत ने मुंबई के विभिन्न रिकॉर्डिंग स्टूडियोज के चक्कर काटे और प्रीतम चक्रवर्ती जैसे देश के शीर्ष म्यूजिक कंपोजर्स के साथ असिस्टेंट, म्यूजिक प्रोड्यूसर और म्यूजिक प्रोग्रामर के तौर पर जमीन से जुड़कर काम किया। वे ट्रैक अरेंजमेंट, वोकल प्रोसेसिंग और साउंड इंजीनियरिंग की बारीकियों को सीख रहे थे। पर्दे के पीछे की इस खामोश मेहनत ने अरिजीत को संगीत के हर तकनीकी पहलू में माहिर बना दिया, जिससे जब उन्हें बाद में माइक थामने का मौका मिला, तो उनकी गायकी में एक दुर्लभ ठहराव और गहराई नजर आई।

'उस समय मैं उनसे बहुत ज्यादा पॉपुलर था': शोहरत और असफलता के दबाव का अंतर

साक्षात्कार के दौरान अभिजीत सावंत ने दोनों के करियर की तुलना करते हुए एक बेहद संवेदनशील पहलू को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर साल 2005 के दौर की बात करें, तो वे खुद अरिजीत सिंह से कहीं ज्यादा लोकप्रिय और चर्चित चेहरा थे। उस समय अरिजीत को आम जनता में कोई नहीं जानता था। लेकिन इस शुरुआती और अप्रत्याशित शोहरत का दूसरा स्याह पहलू यह था कि अभिजीत पर तुरंत हिट गाने देने और स्टारडम को बरकरार रखने का असहनीय दबाव था। हर कोई उनसे सिर्फ सफलता की उम्मीद कर रहा था, जिसने उनके स्वाभाविक विकास की रफ्तार को प्रभावित किया।

इसके विपरीत, अरिजीत सिंह उस दौर में किसी भी प्रकार के सार्वजनिक दबाव या मीडिया की अपेक्षाओं से पूरी तरह मुक्त थे। उन्हें कोई जज नहीं कर रहा था और न ही कोई उनके अगले गाने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। इस स्वतंत्रता ने अरिजीत को गलतियां करने, उनसे सीखने और अपनी कला को तराशने का भरपूर वक्त दिया। अभिजीत के मुताबिक, शुरुआती सफलता मिलने के बाद उसे संभालना और उस बुलंदी पर टिके रहना, जमीन से उठकर धीरे-धीरे शिखर की ओर बढ़ने की तुलना में कई गुना अधिक मानसिक दबाव पैदा करता है।

'तुम ही हो' और डेस्टिनी: जब एक गाने ने बदल दी हिंदी सिनेमा के संगीत की दुनिया

अभिजीत सावंत ने अरिजीत सिंह की अविश्वसनीय सफलता में उनकी कड़ी मेहनत के साथ-साथ सही समय और सही अवसर यानी तकदीर की भूमिका को भी स्वीकार किया। साल 2013 में आई मोहित सूरी की फिल्म 'आशिकी 2' का गाना 'तुम ही हो' अरिजीत के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। अभिजीत ने कहा कि 'तुम ही हो' जैसा ऐतिहासिक गाना किसी भी गायक की झोली में गिरना पूरी तरह से किस्मत और डेस्टिनी का खेल होता है। मिथुन द्वारा कंपोज किया गया यह गाना एक ऐसा जादू था जिसने अरिजीत को बॉलीवुड का बेताज बादशाह बना दिया।

अभिजीत ने संगीत प्रेमियों और आम दर्शकों के दोहरे नजरिए पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह हमारे समाज और दर्शकों की सबसे बड़ी विसंगति है कि जो कलाकार इस समय सफलता के शिखर पर है, हम सिर्फ उसकी जय-जयकार करते हैं और उसके पिछले संघर्षों को भूल जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, जिस कलाकार के मौजूदा काम या जीवन के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते, उसके काम में तुरंत खामियां निकालने लगते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर कलाकार की अपनी एक व्यक्तिगत यात्रा और समय चक्र होता है। हर कोई अपने सामर्थ्य के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहा है, इसलिए कलाकारों की तुलना करने के बजाय उनके सफर का सम्मान किया जाना चाहिए।

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