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ईरान के ‘फुल्ली ऑफेंसिव’ रुख से दहला मिडिल ईस्ट: क्रूड ऑयल में रिकॉर्ड उछाल, ब्रेंट $91 के पार, वैश्विक शेयर बाजारों में मची भारी तबाही

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में कई महीनों से सुलग रही जंग अब एक बेहद खतरनाक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही संघर्षविराम और कूटनीतिक शांति वार्ताओं के बेनतीजा खत्म होने के बाद तेहरान ने सैन्य मोर्चे पर 'फुल्ली ऑफेंसिव' (पूरी तरह आक्रामक) रुख अपनाने का आधिकारिक संकेत दे दिया है। इस ताजा भू-राजनीतिक तनाव ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों, कमोडिटी एक्सचेंजों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में हड़कंप मचा दिया है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल जलमार्ग 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही पर मंडराते खतरे के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड देखते ही देखते 91 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है। ऊर्जा संकट और संभावित महायुद्ध की आशंका से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक निवेशकों के खरबों डॉलर डूब चुके हैं।

ईरान का 'फुल्ली ऑफेंसिव' रुख और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में गहराया संकट

अंतरराष्ट्रीय मीडिया और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के साथ सीजफायर समझौते को आगे बढ़ाने पर सहमति नहीं बन सकी है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह अपने तेल निर्यात और समुद्री सीमाओं पर किसी भी प्रकार की पश्चिमी पाबंदी या सैन्य नाकेबंदी को बर्दाश्त नहीं करेगा। ईरानी सैन्य कमांडरों के आक्रामक बयानों और खाड़ी में नौसैनिक युद्धाभ्यास तेज करने से हॉर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंडेब जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर जहाजों की सुरक्षा स्थिति बेहद नाजुक हो गई है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संकरा और महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है, जिसके रास्ते वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले कुल समुद्री कच्चे तेल का लगभग 20% हिस्सा प्रतिदिन गुजरता है। यहां तेल टैंकरों पर संभावित मिसाइल और ड्रोन हमलों के डर से शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर (सिग्नल) बंद करने शुरू कर दिए हैं, जिससे जहाजों को ट्रैक करना मुश्किल हो गया है। समुद्री बीमा कंपनियों ने खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों का 'वॉर रिस्क प्रीमियम' कई गुना बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक परिवहन और माल ढुलाई लागत में भारी बढ़ोतरी हो गई है।

कच्चे तेल में लगी आग: ब्रेंट क्रूड $91 के पार, क्या $100 तक जाएगा भाव?

ऊर्जा बाजारों में सप्लाई रुकने के डर से फ्यूचर्स ट्रेडिंग में जबरदस्त खरीदारी देखी जा रही है। सिंगापुर और लंदन कमोडिटी एक्सचेंज में ट्रेडिंग शुरू होते ही ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 91.14 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 85.04 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। पिछले एक हफ्ते में ही कच्चे तेल की कीमतों में 6% से अधिक का संचयी उछाल दर्ज किया गया है।

कमोडिटी एनालिस्ट्स का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच सीधा सैन्य टकराव बढ़ता है और हॉर्मुज के रास्ते सप्लाई पूरी तरह बाधित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें बहुत जल्द 100 से 115 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल सकती हैं। ओपेक (OPEC) देशों द्वारा अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने में दिखाई जा रही अनिच्छा और रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते रिफाइंड उत्पादों (डीजल और पेट्रोल) की पहले से चली आ रही तंगी ने इस संकट को और अधिक गहरा बना दिया है। ऊर्जा विशेषज्ञ इसे 2022 के बाद का सबसे बड़ा संभावित ऊर्जा झटका मान रहे हैं।

वैश्विक शेयर बाजारों में हाहाकार: न्यूयॉर्क से टोक्यो तक लाल निशान में इंडेक्स

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के खतरे का सीधा असर दुनिया भर के शेयर बाजारों पर पड़ा है। अमेरिका के प्रमुख बाजार वॉल स्ट्रीट पर डाउ जोन्स (Dow Jones Industrial Average), एसएंडपी 500 (S&P 500) और टेक-हैवी नैस्डैक (Nasdaq) में तेज गिरावट दर्ज की गई है। कच्चे तेल में तेजी के कारण विमानन, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई। यूनाइटेड एयरलाइंस, कार्मिवल क्रूज जैसी बड़ी कंपनियों के शेयर 4% से 5% तक टूट गए।

एशियाई बाजारों में भी इसका तीव्र असर देखने को मिला। जापान का निक्केई (Nikkei), हांगकांग का हैंग सेंग (Hang Seng) और दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) बिकवाली के दबाव में लाल निशान पर बंद हुए। यूरोप में जर्मनी का डैक्स (DAX) और फ्रांस का सीएसी 40 (CAC 40) भी नुकसान में रहे। निवेशक अनिश्चितता के माहौल में जोखिम भरी इक्विटी संपत्तियों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों पर स्थानांतरित कर रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दोहरी मार: सेंसेक्स-निफ्टी पर दबाव

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्येक 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटे (CAD) और राजकोषीय घाटे को सीधे तौर पर बढ़ा देती है। भारतीय शेयर बाजार (BSE Sensex और NSE Nifty) में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की तरफ से बिकवाली तेज हो गई है।

सेक्टोरल स्तर पर इसका सबसे बुरा असर एविएशन (इंडिगो, स्पाइसजेट), पेंट कंपनियों (एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स), टायर और केमिकल मैन्युफैक्चरर्स पर पड़ रहा है, क्योंकि क्रूड ऑयल इनके लिए प्राथमिक कच्चा माल है। दूसरी तरफ, ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया जैसी घरेलू तेल उत्पादक कंपनियों के शेयरों को तेल महंगा होने से तात्कालिक लाभ मिल रहा है। हालांकि, यदि क्रूड लंबे समय तक $90 के ऊपर बना रहा, तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल और सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है, जिससे माल ढुलाई महंगी होगी और खुदरा महंगाई (Retail Inflation) में दोबारा उछाल आ सकता है। महंगाई बढ़ने की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं को गहरा झटका लगेगा।

रुपये में कमजोरी और डॉलर इंडेक्स की मजबूती

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय आयातकों द्वारा अमेरिकी डॉलर की मांग में भारी इजाफा हुआ है। इसके चलते भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में आ गया है। वैश्विक स्तर पर यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूत हुआ है क्योंकि संकट के समय डॉलर को दुनिया की सबसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 4.68% के स्तर पर पहुंच गई है, जिससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि बॉन्ड बाजार में महंगाई और लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों का डर हावी हो रहा है।

सेफ हेवन में शरण: सोने और चांदी में जोरदार तेजी

जब भी दुनिया में युद्ध या बड़े भू-राजनीतिक संकट की स्थिति बनती है, तो निवेशक सोने (Gold) को सबसे सुरक्षित निवेश (Safe Haven Asset) मानकर उसमें पैसा लगाते हैं। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बुलियन मार्केट में 24 कैरेट सोने और चांदी की कीमतों में जोरदार तेजी दर्ज की जा रही है। सोने का भाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़त के साथ कारोबार कर रहा है। विश्लेषकों का अनुमान है कि जब तक मध्य पूर्व में तनाव शांत नहीं होता, तब तक सोने की कीमतों में यह तेजी जारी रह सकती है।

कूटनीति की विफलता और आगे का रास्ता: क्या महायुद्ध टाला जा सकेगा?

कतर, ओमान और पाकिस्तान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे बैक-चैनल डिप्लोमेसी के जरिए तनाव घटाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इसके बावजूद दोनों पक्षों के कड़े रुख के कारण किसी स्थायी समझौते की उम्मीदें फिलहाल धूमिल नजर आ रही हैं। अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और खाड़ी में ईरानी मिसाइल बैटरियों की तैनाती ने इस पूरे इलाके को बारूद के ढेर पर बैठा दिया है।

आने वाले दिन न केवल मध्य पूर्व के भविष्य बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं। वैश्विक व्यापार, सप्लाई चेन और मुद्रास्फीति की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय सैन्य टकराव को रोक पाता है या फिर यह तनाव दुनिया को एक नए और भयावह आर्थिक संकट की ओर धकेल देगा।

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