खेल

एशियन गेम्स में देश के लिए मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों के बीच इनामों का यह कैसा असमान पैमाना

अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जब कोई खिलाड़ी अपने देश के लिए पसीना बहाकर पोडियम पर तिरंगा फहराता है, तो पूरा देश उसकी जीत का जश्न मनाता है। एशियाई खेलों यानी एशियन गेम्स (Asian Games) में भारतीय दल के प्रदर्शन ने पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। चाहे क्रिकेट का मैदान हो या अन्य खेल स्पर्धाएं, भारतीय एथलीटों ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। लेकिन मेडल जीतने के बाद जब खिलाड़ियों पर पुरस्कारों की बारिश होती है, तो कई बार ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं जो प्रशासनिक व्यवस्था और खेल संघों की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर देते हैं। हाल ही में एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को मिलने वाली इनामी राशि और वित्तीय प्रोत्साहन में जो भारी-भरकम अंतर और भेदभाव देखने को मिला है, उसने खेल जगत में एक नई बहस छेड़ दी है।

वाशिंगटन सुंदर को मिले 75 लाख, तो बेंच पर बैठे रहने वाले खिलाड़ी को मिला छप्परफाड़ इनाम

इस पूरे विवाद के केंद्र में भारतीय क्रिकेट टीम के प्रतिभाशाली ऑलराउंडर वाशिंगटन सुंदर और अन्य खिलाड़ियों को मिलने वाली पुरस्कार राशि का तुलनात्मक अध्ययन है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब भारतीय क्रिकेट टीम ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, तो टीम के अहम सदस्य रहे वाशिंगटन सुंदर को राज्य सरकार या खेल बोर्ड की तरफ से लगभग 75 लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई। वाशिंगटन सुंदर ने टूर्नामेंट के दौरान मैदान पर उतरकर अपनी बेहतरीन गेंदबाजी और बल्लेबाजी से टीम की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके विपरीत, उसी स्क्वाड का हिस्सा रहे एक अन्य रिजर्व खिलाड़ी, जिन्हें पूरे टूर्नामेंट के दौरान एक भी मैच में खेलने का मौका तक नहीं मिला और जो पूरे समय बेंच पर बैठे रहे, उन्हें नियमों या अलग-अलग कोटे के तहत इससे कहीं अधिक यानी करोड़ों रुपये का इनाम मिल गया। इस भारी विसंगति के सामने आते ही खेल प्रेमियों और जानकारों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं।

अलग-अलग राज्यों के अपने नियम और खेल संघों की नीतियों का विरोधाभास

इस प्रकार के वित्तीय भेदभाव के पीछे मुख्य रूप से विभिन्न राज्य सरकारों की अलग-अलग खेल नीतियां और पॉलिसीज जिम्मेदार मानी जाती हैं। भारत में केंद्र सरकार और ओलिंपिक एसोसिएशन के अपने नियम होते हैं, लेकिन जब बात राज्यों द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और नकद पुरस्कारों की आती है, तो हर राज्य का पैमाना अलग होता है। कई राज्य सरकारें अपने यहां के मूल निवासी खिलाड़ियों को ओलंपिक और एशियन गेम्स में मेडल जीतने पर सीधे दो से तीन करोड़ रुपये तक की भारी-भरकम राशि और सरकारी नौकरी देती हैं। चूंकि खिलाड़ी अलग-अलग राज्यों से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए एक ही टीम में साथ खेलकर गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद किसी खिलाड़ी को 75 लाख रुपये मिलते हैं, तो किसी अन्य खिलाड़ी को अपनी राज्य सरकार की नीति के कारण करोड़ों रुपये का फायदा मिल जाता है। यह प्रशासनिक और नीतिगत असमानता खेल जगत में अक्सर चर्चा का विषय बनती रही है।

खेल जगत, पूर्व एथलीटों और सोशल मीडिया पर उठते गंभीर सवाल

इस असमानता और भेदभावपूर्ण वित्तीय प्रोत्साहन को लेकर पूर्व खिलाड़ियों, खेल विशेषज्ञों और सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई है। आलोचकों का तर्क है कि जब पूरी टीम ने पसीना बहाकर एक समान लक्ष्य के लिए मुकाबला किया है, और मैदान पर उतरकर मैच जिताने वाले खिलाड़ी को कम राशि मिले जबकि सिर्फ टीम का हिस्सा रहने या बिना एक भी मैच खेले रिजर्व में रहने वाले खिलाड़ी को कई गुना ज्यादा पैसा मिल जाए, तो यह प्रतिभा के साथ सरासर अन्याय है। इससे खिलाड़ियों के बीच मनोबल पर भी असर पड़ता है। खेल प्रेमियों का कहना है कि देश के लिए खेलने वाले सभी खिलाड़ियों के लिए एक समान और पारदर्शी राष्ट्रीय पुरस्कार नीति होनी चाहिए, ताकि इस तरह के क्षेत्रीय या नीतिगत भेदभाव से बचा जा सके और हर खिलाड़ी की मेहनत का सही मूल्यांकन हो सके।

भविष्य के सुधार और एक समान खेल पुरस्कार नीति की आवश्यकता

एशियन गेम्स के इस ताजा प्रकरण ने एक बार फिर से इस बात की आवश्यकता पर जोर दिया है कि भारत के खेल प्रशासन को अपनी वित्तीय नीतियों में बड़े सुधार करने की जरूरत है। यदि देश को खेल महाशक्ति बनना है, तो खिलाड़ियों को मिलने वाले प्रोत्साहन और सम्मान में इस तरह की विसंगतियों को दूर करना अनिवार्य होगा। चाहे वह क्रिकेट हो या अन्य खेल, हर उस एथलीट का सम्मान होना चाहिए जो देश का नाम रोशन करता है। उम्मीद की जा रही है कि इस तरह के मामलों के सामने आने के बाद खेल मंत्रालय और संबंधित बोर्ड भविष्य में ऐसी पारदर्शी नीतियां बनाएंगे जिससे भविष्य में किसी भी खिलाड़ी को इस तरह के वित्तीय भेदभाव का सामना न करना पड़े और सभी का समान रूप से सम्मान हो सके।

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