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BJP Leader : बीजेपी के मार्गदर्शक मुरली मनोहर जोशी ने अपनी ही सरकार के नैरेटिव पर उठाए सवाल

News India Live, Digital Desk: भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शुमार और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने ‘विश्वगुरु’ शब्द के वर्तमान इस्तेमाल पर असहमति जताई है। सोमवार (20 अप्रैल 2026) को दिल्ली में ‘संस्कृत भारती’ के नए केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत कभी विश्वगुरु था और भविष्य में फिर बन सकता है, लेकिन आज खुद को इस संबोधन से नवाजना उचित नहीं है।1. “उपलब्धि तब होगी, जब हम बनेंगे”मुरली मनोहर जोशी ने कार्यक्रम में एक सवाल के जवाब में कहा, “मेरा मानना है कि ‘विश्वगुरु’ शब्द हमें अभी नहीं बोलना चाहिए। हम विश्वगुरु आजकल नहीं हैं। विश्वगुरु होना चाहिए, विश्वगुरु कभी थे, मगर आज हम हैं ऐसा नहीं है।” * सावधानी की सलाह: जोशी ने संकेत दिया कि बिना पूर्ण सामर्थ्य और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल किए इस शब्द का ढिंढोरा पीटना जल्दबाजी हो सकती है।लक्ष्य बनाम वास्तविकता: उन्होंने कहा कि विश्वगुरु बनना हमारा लक्ष्य होना चाहिए, लेकिन वर्तमान स्थिति में ऐसा दावा करना जमीनी हकीकत से दूर है।2. संस्कृत को बताया ‘भविष्य की भाषा’अपने संबोधन के दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता और महत्ता पर विशेष जोर दिया:NASA का संदर्भ: उन्होंने उल्लेख किया कि नासा के वैज्ञानिक भी अब मान रहे हैं कि ‘कम्युनिकेशन’ (संप्रेषण) के लिए संस्कृत दुनिया की सबसे सटीक और महत्वपूर्ण भाषा है।ओपनहाइमर और गीता: परमाणु बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर का उदाहरण देते हुए जोशी ने बताया कि कैसे परमाणु परीक्षण के समय उनके मुंह से भगवद गीता का श्लोक निकला था। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक गहराई का प्रमाण है।3. युवाओं को संदेशजोशी ने देश के युवाओं से अपील की कि वे केवल संस्कृत पढ़ें नहीं, बल्कि इसे लिखना और बोलना भी सीखें। उन्होंने कहा कि अगर भारत संस्कृत को विश्व स्तर पर संचार की भाषा बना सके, तो यह मानवता के लिए भारत की सबसे बड़ी देन होगी।4. सियासी गलियारों में चर्चामुरली मनोहर जोशी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार और भाजपा संगठन अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती साख को ‘विश्वगुरु’ के रूप में पेश करते हैं। ऐसे में पार्टी के ही ‘भीष्म पितामह’ द्वारा इस शब्द पर संयम बरतने की सलाह को राजनीतिक विशेषज्ञ एक ‘मृदु आलोचना’ या ‘वैचारिक सुधार’ के रूप में देख रहे हैं।

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