जयशंकर के फॉर्मूले पर क्या चलेंगे ट्रंप के G2 से सहमे देश

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस वक्त भू-राजस्व और कूटनीति के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया G2 समीकरणों और मुलाकातों ने दुनिया भर के देशों की नींद उड़ा दी है। इस बदलते वैश्विक माहौल के बीच भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक ऐसा बेबाक और दूरदर्शी बयान दिया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा है कि भारत ने अब अमेरिकी सुरक्षा के 'छाते' के बिना वैश्विक बारिश यानी अनिश्चितताओं के बीच रहना सीख लिया है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सबसे ऊपर रखा है। उनका यह फॉर्मूला अब उन तमाम देशों के लिए एक नया पाठ बन गया है जो अमेरिका और चीन के बीच बन रहे नए G2 समझौतों और ध्रुवीकरण से डरे हुए हैं और यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि महाशक्तियों के इस खेल में उनकी अपनी क्या जगह होगी।
ट्रंप-शी जिनपिंग के बीच G2 का बढ़ता साया और दुनिया भर में खलबली
वाशिंगटन और बीजिंग के बीच हाल ही में जिस तरह की कूटनीतिक हलचलें तेज हुई हैं और G2 की चर्चाएं सतह पर आई हैं, उसने पारंपरिक रूप से अमेरिकी सुरक्षा छत्रछाया पर निर्भर रहने वाले देशों कोशशोपंज में डाल दिया है। छोटे और मध्यम वर्ग के देश इस बात को लेकर सहमे हुए हैं कि यदि दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां आपस में मिलकर वैश्विक व्यापार, तकनीक और भू-राजनीतिक फैसले लेने लगेंगी, तो बाकी देशों की संप्रभुता का क्या होगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब बड़ी ताकतें आपस में हाथ मिलाती हैं यासमीकरण बदलती हैं, तब-तब क्षेत्रीय ताकतों और विकासशील देशों पर दबाव बढ़ जाता है। वर्तमान परिदृश्य में जब अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों, आक्रामक शुल्कों और टैरिफ वॉर को लेकर सख्त रुख अपना रहा है, तब दुनिया के कई देश यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या वे भी भारत की तरह बिना किसी बाहरी सुरक्षा कवच के स्वतंत्र रूप से अपनी विदेश और आर्थिक नीति चला पाएंगे या नहीं।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: क्यों दुनिया के लिए मिसाल बन रहा है जयशंकर का विजन
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंचों पर स्पष्ट कर दिया है कि आज का नया भारत किसी एक महाशक्ति के इशारे पर चलने वाला देश नहीं है। उन्होंने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक झटकों को 'बारिश' की संज्ञा देते हुए समझाया कि भारत ने अब ऐसी आत्मनिर्भर और मजबूत नीति अपना ली है जिसे किसी के 'छाते' यानी बैसाखियों की जरूरत नहीं है। रूस से तेल आयात के मामले में पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद जिस तरह भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा और स्वतंत्र फैसले लिए, वह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। जयशंकर के मुताबिक, दुनिया बदल रही है और वाशिंगटन के तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव आ रहा है। ऐसे में हर देश को अमेरिका और अन्य महाशक्तियों के साथ अपने संबंधों का नए सिरे से हिसाब-किताब लगाना होगा। भारत का यह रुख उन देशों के लिए एक मजबूत ब्लूप्रिंट पेश करता है जो महाशक्तियों के आपसी समझौतों के बीच पिसने से बचना चाहते हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और चोकपॉइंट्स पर भारत का मजबूत होता दबदबा
आज की तारीख में भू-राजनीति केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल सप्लाई चेन, एनर्जी सिक्योरिटी और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे 'चोकपॉइंट्स' पर नियंत्रण से तय होती है। भारत ने अपनी कूटनीति को इसी वास्तविकता के आधार पर ढाला है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति अब एक 'मिडिल पावर' से कहीं आगे बढ़कर एक अपरिहार्य और निर्णायक खिलाड़ी की हो चुकी है। जब अमेरिका और चीन अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने में जुटे हैं, तब भारत ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से लेकर ग्लोबल साउथ तक अपनी स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज कराई है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की तरफ से आने वाले आर्थिक दबाव और टैरिफ की धमकियों का मुकाबला करने के लिए दूसरे देश भी अब भारत के 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' यानी रणनीतिक स्वायत्तता वाले मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं, क्योंकि वे समझ चुके हैं कि डरकर जीने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा होना ही एकमात्र विकल्प है।