धर्म

जहां गिरी थीं अमृत की बूंदें, उस प्रयागराज में लगने जा रहा है पापों से मुक्ति दिलाने वाला ‘माघ मेला’

कहते हैं,साल में एक महीना ऐसा आता है,जब प्रयागराज (इलाहाबाद) की धरती पर देवता भी उतर आते हैं और संगम का पानी गंगाजल नहीं, ‘अमृत’बन जाता है। यह पवित्र महीना हैमाघका महीना,और इसी महीने में लगता है दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला -माघ मेला।मान्यता है कि इस एक महीने के दौरान संगम के पवित्र जल में लगाई गई एक डुबकी,इंसान के न जाने कितने जन्मों के पापों को धो देती है और उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का रास्ता दिखाती है। इस बार यह महा-पर्व3जनवरी2026से शुरू हो रहा है।प्रयागराज और माघ मेले का इतना गहरा नाता क्यों है?इसकी कहानी बहुत पुरानी और दिलचस्प है।ब्रह्मा जी का पहला यज्ञ:पुराणों के अनुसार,जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की,तो उन्होंने अपना सबसे पहला’यज्ञ’इसी धरती पर किया था।’प्र’का मतलब है ‘प्रथम’और’याग’का मतलब है ‘यज्ञ’। इसी से इसका नाम पड़ा’प्रयाग’।जब छलकीं अमृत की बूंदें:लेकिन यहां मेला लगने की सबसे बड़ी वजह है अमृत। समुद्र मंथन से जब अमृत का कलश निकला,तो उसे लेकर देवताओं और असुरों में छीना-झपटी होने लगी। इसी दौरान,अमृत की कुछ बूंदें धरती पर चार जगहों पर गिरीं – हरिद्वार,उज्जैन,नासिक और चौथी जगह थीप्रयागराज।माना जाता है कि माघ के महीने में प्रयागराज के संगम का जल साक्षात अमृत के समान हो जाता है,और इसीलिए यहां स्नान का फल मोक्ष देने वाला माना गया है।’कल्पवास’:जब लोग दुनिया छोड़कर,संगम किनारे बस जाते हैंमाघ मेला सिर्फ एक-दो दिन का स्नान नहीं,बल्कि’कल्पवास’का भी समय है। यह एक महीने की एक कठिन आध्यात्मिक यात्रा है,जिसमें हजारों लोग अपना घर-परिवार और सुख-सुविधाएं छोड़कर संगम तट पर तंबुओं में रहते हैं।कल्पवासी इस दौरान:जमीन पर सोते हैं।दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करते हैं।और दिन में तीन बार ठंडे संगम जल में स्नान करते हैं।मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से कल्पवास पूरा करता है,उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।2026माघ मेले के सबसे बड़े स्नान (शाही स्नान)अगर आप पूरे महीने नहीं जा सकते,तो इन खास दिनों पर स्नान का महत्व कई गुना बढ़ जाता है:मकर संक्रांति:इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और मेले की औपचारिक शुरुआत होती है।मौनी अमावस्या:यह माघ मेले का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व है। इस दिन लाखों लोग मौन रहकर डुबकी लगाते हैं।बसंत पंचमी:माँ सरस्वती के पूजन का दिन,इस दिन भी शाही स्नान जैसा माहौल रहता है।माघी पूर्णिमा:इस दिन कल्पवास पूरा होता है और देवता अपने लोकों को लौट जाते हैं।माघ मेला सिर्फ एक मेला नहीं,बल्कि आस्था,विश्वास और खुद को पाने का एक ऐसा अनुभव है,जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता,सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

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