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तमिलनाडु में परिसीमन पर संग्राम: एमके स्टालिन की ‘1960’ वाली चेतावनी और अन्नादुरई का वो दौर, जिसने बदल दी थी दक्षिण की राजनीति

चेन्नई/नई दिल्ली: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (M. K. Stalin) ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि परिसीमन की प्रक्रिया से तमिलनाडु या दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम करने की कोशिश की गई, तो राज्य में 1960 के दशक जैसा भीषण जनआंदोलन होगा।स्टालिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू हो रहा है, जिसमें परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा होनी है।परिसीमन का गणित: दक्षिण को क्यों है डर?दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु का तर्क है कि उन्होंने दशकों तक केंद्र सरकार के परिवार नियोजन कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया और जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई। अब यदि 2026 के बाद जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है, तो उत्तर भारतीय राज्यों (जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है) की सीटें बढ़ जाएंगी और तमिलनाडु जैसे राज्यों की सीटें कम या स्थिर रह जाएंगी।खतरा: स्टालिन का मानना है कि इससे दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत “अन्यायपूर्ण” तरीके से कम हो जाएगी।चेतावनी: “हमारा एक-एक परिवार सड़क पर उतरेगा और पूरा प्रदेश ठप कर देंगे।”1960 का वो दौर और ‘अन्ना’ का उदयस्टालिन ने अपनी चेतावनी में जिस 1960 के दशक का जिक्र किया, वह तमिलनाडु (तब मद्रास प्रेसीडेंसी) के इतिहास का सबसे अशांत काल था। यह वह समय था जब हिंदी विरोधी आंदोलन ने पूरे देश को हिला दिया था।सी. एन. अन्नादुरई: ‘अन्ना’ जिन्होंने जगाई तमिल अस्मिताई.वी. रामास्वामी ‘पेरियार’ के शिष्य और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के संस्थापक सी. एन. अन्नादुरई (जिन्हें लोग प्यार से ‘अन्ना’ कहते थे) इस आंदोलन के सबसे बड़े नायक थे।भाषाई तर्क: जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का दबाव बढ़ा, तो अन्ना ने संसद में एक ऐतिहासिक तर्क दिया— “अगर बहुमत के आधार पर हिंदी को राष्ट्रभाषा माना जाए, तो कौआ राष्ट्रीय पक्षी होना चाहिए, क्योंकि वह मोर से ज्यादा संख्या में है।”1965 का आंदोलन: 26 जनवरी 1965 को अन्ना ने ‘शोक दिवस’ घोषित किया। इस दौरान हुई हिंसा में लगभग 70 लोगों की जान गई। छात्रों के आत्मदाह और उग्र प्रदर्शनों ने केंद्र सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया।नाम परिवर्तन: अन्ना ने ही राज्यसभा में ‘मदरास’ का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ करने की पुरजोर मांग उठाई थी, जिसे बाद में स्वीकार किया गया।सिनेमा और राजनीति का संगमअन्नादुरई ने समझ लिया था कि तमिलनाडु की जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए सिनेमा सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने एम. करुणानिधि और एम.जी. रामचंद्रन (MGR) जैसे सितारों के साथ मिलकर फिल्मों को सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का औजार बनाया। उनके संवाद केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक सांस्कृतिक युद्ध थे।1967: वो चुनाव जिसने इतिहास बदल दियाअन्नादुरई की रणनीति और जनहित के मुद्दों (जैसे चावल और महंगाई) ने 1967 में कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका। साधारण धोती पहनने वाले अन्ना मुख्यमंत्री बने और ‘दो रुपये चावल योजना’ जैसी जनहितैषी नीतियों की शुरुआत की।आज के हालात: इतिहास खुद को दोहरा रहा है?आज एमके स्टालिन जिस तरह से केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं, वह कहीं न कहीं सी. एन. अन्नादुरई की उसी विरासत को आगे ले जाने की कोशिश है। परिसीमन का मुद्दा अब केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि तमिल अस्मिता और क्षेत्रीय शक्ति के सम्मान का प्रतीक बन चुका है।

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