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दिल्ली पुलिस का बड़ा एक्शन, सौरव दास और आशुतोष रांका फिर हिरासत में

देश की राजधानी नई दिल्ली के सबसे चर्चित प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां बेहद तेज हो गई हैं। दिल्ली पुलिस की एक विशेष टीम ने प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और सूचना का अधिकार (RTI) एक्टिविस्ट सौरव दास तथा उनके सहयोगी आशुतोष रांका को उनके कई समर्थकों और साथियों के साथ दोबारा हिरासत में (Detain) ले लिया है। यह पूरी घटना उस वक्त हुई जब ये लोग अपनी पूर्व घोषित मांगों और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जंतर-मंतर पर एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और सभा आयोजित करने पहुंचे थे।

जैसे ही कार्यकर्ताओं ने वहां एकत्रित होकर अपनी नारेबाजी और भाषण शुरू किए, क्षेत्र में तैनात भारी पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों ने हरकत में आते हुए उन्हें तुरंत रोक दिया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिकोण से इस इलाके में धारा 144 और लागू दिशा-निर्देशों का पालन कराया जा रहा है, जिसके चलते बिना पूर्व प्रशासनिक अनुमति के किसी भी प्रकार के बड़े हुजूम या धरना-प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती।

दोबारा डिटेन किए जाने से कार्यकर्ताओं में भारी रोष, पुलिस की कार्यशैली पर उठे सवाल

सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने की यह खबर सामने आते ही नागरिक अधिकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के गुटों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे किसी भी तरह का उपद्रव या कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, बल्कि केवल अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार और जनता के सामने रखना चाहते थे।

इससे पहले भी इन कार्यकर्ताओं को इसी तरह के एक प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था और कुछ घंटों बाद छोड़ दिया गया था। अब एक बार फिर से इस तरह अचानक पुलिसिया कार्रवाई किए जाने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या राजधानी में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने की गुंजाइश खत्म होती जा रही है? हिरासत में लिए जाने के तुरंत बाद पुलिस सौरव दास और आशुतोष रांका को बस में बैठाकर नजदीकी पुलिस स्टेशन (संभवतः संसद मार्ग या मंदिर मार्ग थाना) ले गई, जहां उनसे पूछताछ की जा रही है और आवश्यक कानूनी कागजी कार्रवाई पूरी की जा रही है।

दिल्ली में धारा 144 और कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच आखिर क्यों बढ़ा टकराव?

दिल्ली पुलिस प्रशासन का इस पूरे घटनाक्रम पर रुख बेहद साफ और सख्त है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि नई दिल्ली का जंतर-मंतर क्षेत्र बेहद संवेदनशील इलाका है, जो संसद भवन, विभिन्न मंत्रालयों और राष्ट्रपति भवन के काफी करीब है। ऐसे में किसी भी संगठन या समूह द्वारा बिना अग्रिम पुलिस स्वीकृति (Prior Permission) के मंच तैयार करना या भीड़ जुटाना सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

हाल के दिनों में दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बैरिकेडिंग और पुलिस बल की तैनाती बढ़ा दी गई है। पुलिस का तर्क है कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी पहली प्राथमिकता है, और जो भी व्यक्ति या समूह नियमों का उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ नियमानुसार प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया और आने वाले दिनों में क्या होंगे इसके कानूनी मायने?

सौरव दास और आशुतोष रांका की इस अचानक गिरफ्तारी और हिरासत की घटना के बाद मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न एक्टिविस्ट ग्रुप्स ने सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। कई प्रमुख कानूनी विशेषज्ञों और वकीलों ने भी इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी चिंता जताई है। उनका मानना है कि किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने से रोकना या बार-बार बिना किसी गंभीर आपराधिक आधार के डिटेन करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

अब देखना यह होगा कि दिल्ली पुलिस इन कार्यकर्ताओं को मुचलके पर कब तक रिहा करती है या फिर इस मामले में आगे कोई एफआईआर (FIR) या औपचारिक कानूनी कार्रवाई दर्ज की जाती है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी के भीतर नागरिक अधिकारों, प्रशासनिक अनुमतियों और पुलिसिया अधिकारों के बीच की पतली रेखा पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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