देश में बदला आबादी का ट्रेंड: यूपी-बिहार में तेजी से घटी जन्म दर, दक्षिण के राज्यों में TFR में मामूली बढ़ोतरी

भारत में जनसंख्या वृद्धि और जन्म दर (Birth Rate) को लेकर एक बड़ा और दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। संसद में 24 जुलाई 2026 को पेश राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के नवीनतम आंकड़ों ने देश के जनसांख्यिकी (Demographic Trend) का नया खाका पेश किया है। लंबे समय से उच्च आबादी वृद्धि वाले माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में फर्टिलिटी रेट तेजी से गिरा है, जबकि दक्षिण के जिन राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर चिंताएं जताई जा रही थीं, वहां टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश का औसतन फर्टिलिटी रेट 2.0 पर बना हुआ है, जो कि रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से नीचे है। आइए एक पॉलिसी और डेटा विश्लेषक के नजरिए से समझते हैं कि राज्यों के फर्टिलिटी रेट में आए इस बड़े बदलाव के मायने क्या हैं।
1. यूपी-बिहार में सिमट रहा परिवारों का आकार
देश की सर्वाधिक आबादी वाले राज्यों में जन्म दर में आई गिरावट यह दर्शाती है कि जागरूकता, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते अब वहां भी छोटे परिवारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है:
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बिहार: NFHS-5 (2019-21) में बिहार का TFR 3.0 था, जो अब घटकर 2.7 रह गया है।
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उत्तर प्रदेश: यूपी में TFR 2.4 से घटकर 2.2 पर आ गया है।
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झारखंड: झारखंड में भी TFR घटकर 2.2 पर दर्ज किया गया है।
भले ही बिहार अभी भी देश में सबसे ज्यादा फर्टिलिटी रेट (2.7) वाला राज्य है, लेकिन इसमें आई गिरावट एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करती है।
2. दक्षिण के राज्यों में TFR में हल्की बढ़ोतरी
दक्षिण भारत के राज्यों में TFR पहले से ही रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से काफी नीचे चल रहा था, जिससे वहां भविष्य में कामकाजी आबादी (Working Population) घटने और बुजुर्गों की आबादी बढ़ने का खतरा मंडरा रहा था। NFHS-6 में वहां कुछ सुधार देखने को मिला है:
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आंध्र प्रदेश: फर्टिलिटी रेट 1.7 से बढ़कर 1.8 हुआ।
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कर्नाटक: TFR 1.7 से बढ़कर 1.8 हुआ।
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तेलंगाना: TFR 1.8 से बढ़कर 1.9 दर्ज किया गया।
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केरल और तमिलनाडु: केरल में TFR 1.8 और तमिलनाडु में 1.7 पर बना हुआ है।
3. देश में सबसे कम और सबसे ज्यादा TFR वाले राज्य/UTs
| राज्य / केंद्र शासित प्रदेश | NFHS-5 (2019-21) TFR | NFHS-6 (2023-24) TFR |
| अंडमान-निकोबार (सबसे कम) | 1.3 | 0.9 |
| सिक्किम | 1.1 | 1.0 |
| बिहार (सबसे ज्यादा) | 3.0 | 2.7 |
| उत्तर प्रदेश | 2.4 | 2.2 |
| झारखंड | 2.3 | 2.2 |
| लक्षद्वीप | 1.4 | 2.2 |
| मेघालय | 2.9 | 2.1 |
| मध्य प्रदेश | 2.0 | 2.1 |
(नोट: लक्षद्वीप में TFR 1.4 से उछलकर 2.2 हुआ है, जो केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे बड़ा बदलाव है।)
घटती-बढ़ती जन्म दर: फायदे और चुनौतियां
जन्म दर घटने के नुकसान और चुनौतियां:
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कामकाजी आबादी में कमी: लंबे समय में युवाओं की संख्या घटने से उद्योगों को 'वर्क्स फोर्स' या मजदूरों की कमी झेलनी पड़ सकती है।
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बुजुर्ग आबादी पर निर्भरता (Dependency Ratio): बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सोशल सिक्योरिटी बजट पर भारी दबाव पड़ेगा।
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परिसीमन (Delimitation) का राजनीतिक विवाद: जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों (विशेषकर दक्षिण) को संसद में सीटों के नुकसान का डर सताता रहता है।
जन्म दर घटने के मुख्य फायदे:
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संसाधनों की बेहतर उपलब्धता: छोटे परिवार होने से शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रति व्यक्ति आय के स्तर में तेजी से सुधार आता है।
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महिला कार्यबल में वृद्धि: बच्चों की जिम्मेदारी कम होने से महिलाओं को वर्कफोर्स और नौकरियों में शामिल होने के बेहतर अवसर मिलते हैं।
सरकार का रुख और योजनाएं
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, सरकार का फोकस 'हेल्दी मदरहुड' और दो बच्चों के बीच सही गैप (Healthy Timing & Spacing of Pregnancies) पर है। इसके लिए 'मिशन परिवार विकास' के तहत 13 प्रमुख राज्यों (यूपी, बिहार, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़, असम आदि) में घर-घर आधुनिक गर्भनिरोधक साधन और परामर्श सेवाएं प्रदान की जा रही हैं।