व्यापार

देश में रोजगार के नए अवसर पैदा करना ही है असली समाधान

भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां विकास दर, महंगाई, शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आम आदमी से लेकर नीति निर्माताओं तक के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं। अक्सर जब भी शेयर बाजार में मंदी आती है या कॉर्पोरेट जगत पर दबाव बढ़ता है, तो उद्योगपतियों और निवेशकों की तरफ से सरकार से यह मांग की जाती है कि टैक्स दरों में कटौती की जाए ताकि बाजार को राहत मिल सके। लेकिन हालिया आर्थिक विश्लेषण और देश के नामी वित्तीय विशेषज्ञों ने एक बहुत बड़ी और दो टूक बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टैक्सों में राहत देने या उन्हें हटाने भर से बाजार की सेहत हमेशा के लिए नहीं सुधर सकती। देश की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक पटरी पर रखने और उसकी नींव को मजबूत करने के लिए सरकार को टैक्स में छूट के अलावा जमीनी स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर सबसे ज्यादा फोकस करना होगा। आइए एक आर्थिक रिपोर्टर की नजर से गहराई से समझते हैं कि आखिर इस पूरी बहस के पीछे के आर्थिक मायने क्या हैं।

टैक्स कटौती से मिलने वाली फौरी राहत और उसकी अपनी एक सीमित सीमा

इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब सरकार कॉरपोरेट टैक्स, जीएसटी या इनकम टैक्स में किसी प्रकार की कटौती करती है, तो कंपनियों के पास निवेश करने के लिए अधिक पूंजी बच जाती है और शेयर बाजार में कुछ समय के लिए तेजी का माहौल बन जाता है। निवेशक खुश होते हैं और कंपनियों के शेयर भाव ऊपर चढ़ने लगते हैं। लेकिन यह राहत सिर्फ एक तात्कालिक या शॉर्ट-टर्म टॉनिक की तरह काम करती है। यदि देश की आम जनता की जेब में पैसा ही नहीं होगा और उनके पास नियमित आय का साधन यानी रोजगार नहीं होगा, तो वे बाजार से सामान नहीं खरीदेंगे। जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग (Demand) ही नहीं बढ़ेगी, तो बड़ी-बड़ी कंपनियां चाहे उन पर कितना भी कम टैक्स क्यों न लग रहा हो, वे अपने उत्पादन (Production) को कैसे बढ़ाएंगी? यही वजह है कि आर्थिक विश्लेषक यह बार-बार कह रहे हैं कि केवल टैक्स कम करना किसी भी अर्थव्यवस्था की बीमारी का पक्का इलाज नहीं हो सकता।

डिमांड और कंजम्पशन का असली चक्र: जब तक जेब में पैसा नहीं, तब तक बाजार में तेजी नहीं

अर्थशास्त्र का सीधा और बुनियादी नियम यह है कि बाजार की चाल पूरी तरह से उपभोक्ता की क्रय शक्ति यानी परचेजिंग पावर (Purchasing Power) पर टिकी होती है। यदि एक आम नागरिक के पास अच्छी नौकरी है, उसे हर महीने निश्चित वेतन मिल रहा है, तो वह खुलकर खर्च करेगा। वह नया घर खरीदेगा, गाड़ी खरीदेगा, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर खर्च करेगा। इस खर्च से देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, सर्विस सेक्टर और रिटेल सेक्टर में बूम आएगा। जब कंपनियां मुनाफा कमाएंगी, तो वे सरकार को खुद-ब-खुद भारी-भरकम टैक्स चुकाएंगी। इसके उलट, यदि युवाओं के पास रोजगार नहीं होगा और वे बेरोजगारी के संकट से जूझ रहे होंगे, तो सरकार चाहे सारे टैक्स जीरो ही क्यों न कर दे, देश के बाजारों में सन्नाटा पसरा रहेगा क्योंकि चीजें खरीदने वाले ग्राहक ही बाजार से गायब होंगे। इसलिए असली चुनौती टैक्स से ज्यादा आम आदमी की क्रय शक्ति को बढ़ाने की है।

भारत जैसे युवा देश में रोजगार सृजन क्यों है आज की सबसे बड़ी जरूरत?

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जहां हर साल करोड़ों युवा अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में मार्केट में उतरते हैं। यदि इन युवाओं को समय पर रोजगार नहीं मिला, तो यह जनसांख्यकीय लाभांश (Demographic Dividend) एक बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट में बदल सकता है। आज के समय में ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीकों के आने से पारंपरिक नौकरियां तेजी से कम हो रही हैं। ऐसे में केवल बड़े उद्योगों को टैक्स छूट देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सरकार को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSME) को मजबूत करना होगा। एमएसएमई सेक्टर ही देश में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करता है। जब तक छोटे उद्योगों, स्टार्टअप्स और निर्माण क्षेत्र को वित्तीय सहायता, आसान लोन और बुनियादी ढांचे का समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक जमीनी स्तर पर नौकरियों के नए द्वार नहीं खुल सकते।

सरकार और नीति निर्माताओं को दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों पर देना होगा जोर

इस पूरी स्थिति का सार यही है कि केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी आर्थिक नीतियों में तात्कालिक लोकलुभावन फैसलों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक (Long-term) सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। टैक्स रिफॉर्म्स बेशक जरूरी हैं ताकि कारोबार करना आसान हो सके, लेकिन इसके साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग हब का विस्तार, कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और सेवा क्षेत्र में नए अवसरों का सृजन करना अनिवार्य है। जब देश के हर युवा के हाथ में रोजगार होगा, उसकी आय बढ़ेगी, तो देश की अर्थव्यवस्था का चक्र अपने आप तेजी से घूमने लगेगा। निवेशकों को भी यह बात समझनी होगी कि शेयर बाजार की असली ताकत किसी टैक्स छूट में नहीं, बल्कि मजबूत कंज्यूमर बेस और रोजगार से भरी हुई अर्थव्यवस्था में छिपी होती है।

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