नीतीश कुमार के संकटमोचक पीके शाही ने अचानक छोड़ा महाधिवक्ता का पद, बिहार की कानूनी सियासत में बड़ा उलटफेर

बिहार के सियासी और प्रशासनिक हलकों से इस वक्त की बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शुमार और राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) प्रशांत कुमार शाही (पी.के. शाही) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले कई सालों से पटना हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बिहार सरकार की मजबूत कानूनी पैरवी करने वाले पीके शाही के इस अचानक इस्तीफे ने राज्य के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस इस्तीफे के बाद बिहार सरकार के विधि विभाग में बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है।
नीतीश सरकार के सबसे बड़े कानूनी संकटमोचक थे पीके शाही
वरिष्ठ अधिवक्ता पीके शाही का शुमार बिहार के उन चुनिंदा चेहरों में होता है जिन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। सरकार पर जब भी कोई कानूनी संकट आया या किसी नीतिगत फैसले पर अदालत की रोक लगी, पीके शाही हमेशा नीतीश कुमार के लिए ढाल बनकर खड़े रहे। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य सरकार का पक्ष बेहद मजबूती से अदालतों के सामने रखा। चाहे वह राज्य का आरक्षण का मुद्दा हो, जातीय गणना का पेचीदा मामला हो या फिर नियोजित शिक्षकों से जुड़े बड़े कानूनी विवाद, पीके शाही ने अपनी दलीलों से सरकार को कई बार बड़ी राहत दिलाई थी।
पूर्व शिक्षा मंत्री और राजनीति के चाणक्य भी रहे हैं शाही
पीके शाही का सफर सिर्फ अदालती कमरों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि वे बिहार की सक्रिय राजनीति का भी एक बड़ा और कद्दावर हिस्सा रहे हैं। नीतीश कुमार के पिछले कार्यकालों के दौरान वे जेडीयू (JDU) कोटे से बिहार के शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। कानूनी समझ और राजनीतिक अनुभव के इस बेजोड़ मेल के कारण ही उन्हें साल 2023 में दोबारा बिहार का महाधिवक्ता नियुक्त किया गया था। इससे पहले भी वे साल 2005 से 2010 तक इस सम्मानित पद पर रहकर अपनी सेवाएं दे चुके थे।
इस्तीफे की इनसाइड स्टोरी और प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट
पीके शाही द्वारा अचानक पद छोड़ने की वजहों को लेकर पटना के प्रशासनिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी तक इस्तीफे के मुख्य कारणों का खुलासा नहीं किया गया है और इसे निजी कारणों से लिया गया फैसला बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इसके पीछे राज्य की आगामी रणनीतिक और प्रशासनिक तैयारियां भी हो सकती हैं। नीतीश सरकार अब नए महाधिवक्ता की नियुक्ति के लिए मंथन शुरू कर चुकी है, क्योंकि आने वाले दिनों में सरकार को कई अहम कानूनी मोर्चों पर अदालती परीक्षाओं से गुजरना है।