विदेश

नेपाल की लाख गुहार के बाद भी चीन नहीं खोल रहा तातोपानी बॉर्डर

नेपाल और चीन के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, और इस बार इसका सीधा असर नेपाल के आम नागरिकों और व्यापारियों की जेब और खुशियों पर पड़ रहा है। नेपाल की सरकार से लेकर स्थानीय लोगों और व्यापारियों द्वारा लगातार गुहार लगाने के बावजूद चीन ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण तातोपानी बॉर्डर (Tatopani Border) को अभी तक पूरी तरह से नहीं खोला है। त्योहारों का सीजन सिर पर है और नेपाल के बाजारों में सामानों की भारी किल्लत शुरू हो चुकी है, जिससे देश भर में तनाव का माहौल बनता जा रहा है। ऐसे में काठमांडू के लोकप्रिय और आक्रामक मेयर बालेन शाह (Balen Shah) के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि जनता अब उनसे इस संकट से निपटने के लिए किसी ठोस कदम की उम्मीद कर रही है।

तातोपानी बॉर्डर बंद होने से नेपाल के बाजारों में त्योहारों से पहले हाहाकार

नेपाल में इस समय दशैं और तिहार जैसे सबसे बड़े और पवित्र त्योहारों की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं, और इन त्योहारों के दौरान कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक सामानों, गिफ्ट्स और दैनिक उपयोग की चीजों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। नेपाल अपनी रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं के लिए बड़े पैमाने पर चीन से होने वाले आयात पर निर्भर रहता है, और तातोपानी बॉर्डर दोनों देशों के बीच व्यापार का एक मुख्य मार्ग है। पिछले काफी समय से यह बॉर्डर बंद या आंशिक रूप से बाधित चल रहा है, जिसके कारण चीन से आने वाले सामानों से भरे सैकड़ों कंटेनर रास्ते में ही अटके पड़े हैं। जब समय पर सामान बाजारों तक नहीं पहुंचेगा, तो व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और आम जनता को आसमान छूती कीमतों पर सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे देश में आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह का दबाव बढ़ रहा है।

नेपाल सरकार की लाख मिन्नतों और कूटनीतिक गुहार पर भी ड्रैगन का अड़ियल रवैया

नेपाल के विदेश मंत्रालय और व्यापारिक संगठनों ने बीजिंग के समक्ष कई बार औपचारिक और अनौपचारिक रूप से गुहार लगाई है कि इस सीमा द्वार को जल्द से जल्द पूरी क्षमता के साथ खोल दिया जाए ताकि व्यापार सुचारू हो सके। इसके बावजूद चीनी अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन की तरफ से कोई भी सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है, और वे सुरक्षा या तकनीकी कारणों का हवाला देकर मामले को टालते आ रहे हैं। चीन का यह अड़ियल और मनमाना रवैया नेपाल की संप्रभुता और आर्थिक प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। नेपाली मीडिया और जानकारों का मानना है कि ड्रैगन की इस कूटनीतिक उदासीनता के कारण नेपाल के व्यापारियों को दिवालिया होने का खतरा सता रहा है, लेकिन काठमांडू के हुक्मरान बीजिंग के सामने खुलकर आवाज उठाने से कतरा रहे हैं।

मेयर बालेन शाह की एंट्री और इस गंभीर संकट पर जनता की नजरें

इस विकट परिस्थिति के बीच काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह अपनी बेबाक कार्यशैली और जनता के प्रति कड़े तेवरों के लिए जाने जाते हैं। व्यापारियों और आम नागरिकों ने अब अनौपचारिक रूप से बालेन शाह से इस मामले में हस्तक्षेप करने और केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की अपील शुरू कर दी है। बालेन शाह हमेशा से विदेशी दखलंदाजी और प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ मुखर रहे हैं, ऐसे में त्योहारों के मुहाने पर खड़ी इस बड़ी मुसीबत के समाधान के लिए लोग उनकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। हालांकि यह मामला पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय सीमा व्यापार और कूटनीति के दायरे में आता है, लेकिन एक जननेता के रूप में बालेन शाह का प्रभाव देश की राजनीति में बहुत गहरा है।

सीमावर्ती इलाकों के व्यापारियों का दर्द और आर्थिक तंगी का बढ़ता संकट

तातोपानी और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले छोटे-बड़े व्यापारी पूरी तरह से इस बॉर्डर के खुलने पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि उनका पूरा साल इसी सीजन के कारोबार पर टिका होता है। बॉर्डर बंद रहने के कारण गोदाम खाली पड़े हैं, कर्ज का ब्याज लगातार बढ़ रहा है और बैंक के अधिकारी लगातार पैसे चुकाने का दबाव बना रहे हैं। यदि आने वाले कुछ दिनों के भीतर चीन की तरफ से बॉर्डर को हरी झंडी नहीं दिखाई जाती है, तो नेपाल के बाजारों में वस्तुओं की कृत्रिम कमी के साथ-साथ महंगाई का एक ऐसा विस्फोट होगा जिसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा। स्थानीय युवा और व्यापारी अब सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने की चेतावनी दे रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में नेपाल की घरेलू राजनीति में भीवान उबाल देखने को मिल सकता है।

क्या चीन के आगे झुक जाएगा नेपाल या ड्रैगन को झुकना होगा?

यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर यह साबित करता है कि नेपाल अपनी अर्थव्यवस्था और व्यापार के मामलों में किस तरह पड़ोसी देशों की नीतियों पर बुरी तरह आश्रित है। नेपाल के हुक्मरानों को अब दीर्घकालिक समाधान खोजने होंगे ताकि हर साल त्योहारों के सीजन में इस तरह की कृत्रिम या राजनीतिक बाधाओं का सामना न करना पड़े। दूसरी ओर, चीन की इस जिद के बाद नेपाल के युवाओं में एक बार फिर एंटी-चाइना सेंटीमेंट मजबूत हो रहा है, जो भविष्य के कूटनीतिक संबंधों के लिए बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या नेपाल की कूटनीति इस दबाव के आगे सफल होती है या फिर मेयर बालेन शाह और जनता के सामूहिक विरोध के सामने सरकार कोई नया और कड़ा रुख अख्तियार करती है।

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