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Indian Economy : फ्रीबीज या विकास? SBI की इस चेतावनी ने बढ़ाई सरकार की टेंशन, बताया कैसे सुधरेगी देश की अर्थव्यवस्था

News India Live, Digital Desk: क्या मुफ्त की योजनाएं देश की तरक्की में रोड़ा बन रही हैं? देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की हालिया रिपोर्ट ने एक नई बहस छेड़ दी है। बैंक ने आगाह किया है कि ‘फ्री रेवड़ी’ (Freebies) कल्चर राज्यों की आर्थिक सेहत बिगाड़ रहा है, जिसका सीधा असर देश के राष्ट्रीय विकास पर पड़ सकता है। रिपोर्ट में मुफ्त सुविधाओं के बजाय ‘रोजगार सृजन’ पर जोर देने की सख्त सलाह दी गई है।राजकोषीय घाटे का बढ़ता खतराSBI के अर्थशास्त्रियों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि कई राज्यों का बजट अब विकास कार्यों के बजाय मुफ्त बिजली, पानी और अन्य सब्सिडियों पर ज्यादा खर्च हो रहा है। इससे राज्यों पर कर्ज का बोझ $\text{Debt-to-GSDP Ratio}$ लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए फंड की कमी हो सकती है।”मुफ्त की रेवड़ी” नहीं, “काम का हाथ” चाहिएएसबीआई की रिपोर्ट में एक अहम सुझाव दिया गया है: ‘Asset Creation’. बैंक का मानना है कि जनता को सीधे पैसे या मुफ्त सुविधाएं देने के बजाय, सरकार को ऐसी योजनाओं में निवेश करना चाहिए जिससे लंबे समय तक चलने वाली संपत्तियां बनें और युवाओं के लिए नौकरियों के अवसर पैदा हों। जब लोगों के पास रोजगार होगा, तो वे स्वयं अर्थव्यवस्था में योगदान देंगे, जिससे GDP में उछाल आएगा।क्या विकास की रफ्तार हो रही है धीमी?रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि जब सरकार का एक बड़ा हिस्सा गैर-उत्पादक खर्चों (Non-productive expenses) में चला जाता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचार (Innovation) जैसे क्षेत्रों को पर्याप्त बजट नहीं मिल पाता। इससे लंबी अवधि में देश की ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस (Global Competitiveness) प्रभावित हो सकती है।विशेषज्ञों की राय: संतुलन बनाना है जरूरीआर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाएं (Welfare Schemes) जरूरी हैं, लेकिन उन्हें ‘पॉलिटिकल टूल’ नहीं बनना चाहिए। SBI ने स्पष्ट किया है कि केवल वही मुफ्त योजनाएं सही हैं जो समाज के सबसे निचले तबके को सशक्त करें, न कि वे जो पूरे सिस्टम को कर्ज के जाल में फंसा दें।

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