विदेश

पाकिस्तान का तेहरान पर सबसे बड़ा आर्थिक प्रहार: रातों-रात सील की गईं अंतरराष्ट्रीय सीमाएं

दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर से भारी भूचाल आ गया है, क्योंकि पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश ईरान के खिलाफ एक बहुत बड़ा और आक्रामक आर्थिक कदम उठाया है। वाशिंगटन यानी अमेरिका के सीधे दबाव और गुप्त संकेतों के बाद पाकिस्तान की सरकार ने ईरान के साथ लगने वाली अपनी तमाम प्रमुख जमीनी व्यापारिक और आवाजाही सीमाओं को पूरी तरह से बंद यानी सील कर दिया है। इस फैसले के बाद दोनों देशों के बीच होने वाला अरबों डॉलर का सीमावर्ती व्यापार पूरी तरह से ठप पड़ गया है। पाकिस्तान के इस कदम को तेहरान के खिलाफ एक सुनियोजित और कड़ा आर्थिक हमला माना जा रहा है, जिससे पहले से ही अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान की अर्थव्यवस्था पर और अधिक दबाव पड़ने की आशंका गहरा गई है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान की इस कार्रवाई से ईरान की अर्थव्यवस्था सचमुच दिवालिया होने की कगार पर पहुंच जाएगी या इसके परिणाम कुछ और ही निकलेंगे।

अमेरिका के इशारे पर उठाया गया कदम और आपसी संबंधों में बढ़ती खटास

पिछले कुछ समय से पाकिस्तान और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों में कड़वाहट लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन सीमा सील करने का यह ताज़ा फैसला पूरी तरह से अमेरिकी भू-राजनीतिक हितों से प्रेरित बताया जा रहा है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र और क्षेत्रीय बाजारों से पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाए ताकि उसके परमाणु और क्षेत्रीय कार्यक्रमों पर लगाम कसी जा सके। पाकिस्तान, जो खुद अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था और आईएमएफ (IMF) के कर्ज के जाल से उबरने के लिए अमेरिकी और पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर बुरी तरह निर्भर है, उसने वाशिंगटन को खुश करने के लिए ईरान के साथ अपने पारंपरिक व्यापारिक रिश्तों की बलि चढ़ा दी है। रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि इस जमीनी सीमा के बंद होने से ईरान के साथ-साथ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के उन स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों को भी भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है जो सस्ते ईरानी ईंधन, एलपीजी और खाद्य पदार्थों पर जिंदा थे।

क्या सचमुच तेहरान दिवालिया हो जाएगा? ईरान पर इस आर्थिक वार का असल असर

सवाल यह उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान द्वारा सीमा सील किए जाने से ईरान सचमुच दिवालिया हो जाएगा? आर्थिक विशेषज्ञों का विश्लेषण इसके बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करता है। भले ही पाकिस्तान के इस कदम से ईरान के सीमावर्ती प्रांतों और छोटे व्यापारियों को तात्कालिक झटका लगा हो, लेकिन ईरान लंबे समय से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के साये में जीने का अभ्यस्त हो चुका है। ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को जीवित रखने के लिए चीन, रूस, इराक और तुर्की जैसे देशों के साथ बड़े पैमाने पर तेल और गैस का व्यापार करता है, जिस पर पाकिस्तान के इस फैसले का कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। इसके अलावा, ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए जो रास्ते निकाले हैं, वे पश्चिमी और अमेरिकी प्रतिबंधों को मात देने में काफी हद तक कारगर साबित हुए हैं। हालांकि, इसमें कोई दोराय नहीं है कि पाकिस्तान की इस शत्रुतापूर्ण कार्रवाई से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दूरियां और अधिक बढ़ गई हैं, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे मध्य एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकते हैं।

क्षेत्रीय राजनीति और व्यापारिक गलियारों पर मंडराते नए खतरे

पाकिस्तान और ईरान की सीमाओं के सील होने से न केवल दो पड़ोसी देशों के रिश्ते रसातल में चले गए हैं, बल्कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापारिक गलियारों के भविष्य पर भी गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ईरान और पाकिस्तान के बीच गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट (IP Gas Pipeline) जो पहले से ही ठंडे बस्ते में था, अब इस घटना के बाद पूरी तरह से दफन होने की कगार पर पहुंच गया है। इसके अलावा, ईरान के चाबहार बंदरगाह और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के बीच चल रही रणनीतिक रस्साकशी में भी अब और अधिक तेजी आने की उम्मीद है। भारत जैसी बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल पर बारीक नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार की दिशा को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि तेहरान इस्लामाबाद के इस अप्रत्याशित और कड़े आर्थिक वार का कूटनीतिक या आर्थिक रूप से क्या और किस तरह का करारा जवाब देता है।

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