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पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश में तुर्की की एंट्री से बढ़ी टेंशन, राष्ट्रपति एर्दोगन का इस्लामिक कैम्पेन और भारत के लिए कितना बड़ा खतरा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों पर इस समय दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहा है। पाकिस्तान के बाद अब तुर्की (तुर्किए) के राष्ट्रपति रेसेप त्वायिप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) की नजरें भारत के पूर्वी पड़ोसी देश बांग्लादेश पर टिक चुकी हैं। तुर्की जिस तरह से आक्रामक कूटनीति और रक्षा समझौतों के जरिए बांग्लादेश के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ा रहा है, उससे नई दिल्ली की सामरिक चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एर्दोगन का यह 'इस्लामिक कैम्पेन' और नया कूटनीतिक गठजोड़ भारत के सामरिक हितों के लिए एक बहुत बड़ा संकेत और भविष्य की बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इस भू-राजनीतिक हलचल के बाद से ही वैश्विक मंचों से लेकर भारतीय सुरक्षा गलियारों तक इस बात पर माथापच्ची शुरू हो गई है कि आखिर इस नए समीकरण के पीछे तुर्की की असली मंशा क्या है और यह भारत के लिए कितना नुकसानदेह हो सकता है।

तुर्की की 'नियो-ऑटोमन' नीति और दक्षिण एशिया में पांव पसारने की चाल

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन पिछले कुछ वर्षों से लगातार एक महत्वाकांक्षी 'नियो-ऑटोमन' (Neo-Ottoman) विदेश नीति पर काम कर रहे हैं। इसके तहत तुर्की मुस्लिम बहुल देशों के बीच अपनी पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साख को दोबारा स्थापित करना चाहता है और पारंपरिक सऊदी अरब के नेतृत्व को चुनौती देकर इस्लामिक दुनिया का नया खलीफा या सिरमौर बनने की फिराक में है। पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने के साथ-साथ अंकारा अब एशिया और विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपने प्रभाव का दायरा लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान के साथ उसका पुराना और घनिष्ठ सैन्य-कूटनीतिक गठजोड़ जगजाहिर है, और अब ठीक उसी तर्ज पर बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर तुर्की वहां अपने सामरिक पैर पसारने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।

रक्षा समझौतों और हथियारों की डील के जरिए बांग्लादेश में पैठ

तुर्की और बांग्लादेश के बीच बढ़ते संबंधों का सबसे खतरनाक पहलू रक्षा और सैन्य सहयोग (Defence Cooperation) में आया भारी उछाल है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश ने तुर्की के साथ कई बड़े रक्षा सौदे किए हैं। तुर्की के प्रसिद्ध बैरकटार टीबी2 (Bayraktar TB2) सशस्त्र ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, बख्तरबंद गाड़ियां और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरणों की खरीद में ढाका ने गहरी दिलचस्पी दिखाई है। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणालियों और सह-उत्पादन (Co-production) को लेकर भी बातचीत अंतिम चरणों में है। तुर्की की नौसेना और रक्षा कंपनियां बांग्लादेशी सेना के विशेष बलों को आधुनिक युद्धक प्रशिक्षण दे रही हैं। रक्षा जानकारों का कहना है कि तुर्की का यह रक्षा निर्यात केवल व्यापारिक नहीं है, बल्कि इसके जरिए वह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के सामरिक क्षेत्र में एक स्थायी सैन्य पैठ बनाना चाहता है।

भारत के लिए सामरिक और सुरक्षा की दृष्टि से क्यों है यह चिंता का विषय

भारत के लिहाज से देखें तो पूर्वी सीमा पर बांग्लादेश के साथ तुर्की की यह बढ़ती नजदीकी किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। पाकिस्तान के बाद अब भारत के पूर्वी मोर्चे पर भी एक ऐसे देश का प्रभाव बढ़ना जो लगातार कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत विरोधी रुख अपनाता रहा है, नई दिल्ली के लिए रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है। इसके अलावा, तुर्की से जुड़े कुछ गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और कट्टरपंथी वैचारिक समूहों की गतिविधियों पर भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर है। हाल ही में कुछ ऐसे नक्शे और वैचारिक एजेंडे भी सामने आए थे जिनमें भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल को लेकर आपत्तिजनक बातें प्रचारित की गईं। क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन, पाकिस्तान और तुर्की का यह नया अनौपचारिक محور (Axis) धरातल पर मजबूत होता है, तो भारत को अपनी समुद्री और थलीय सीमाओं दोनों मोर्चों पर सुरक्षा के मोर्चे पर और अधिक सतर्क होना पड़ेगा।

भारत की कूटनीतिक प्रतिक्रिया और भविष्य की रणनीति

इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक संस्थाएं बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। भारत अपनी नेबरहुड फर्स्ट (Neighborhood First) नीति के तहत अपने पड़ोसी देशों के साथ मजबूत और भरोसेमंद संबंध बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास करता रहा है, लेकिन संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। भारत को अपनी समुद्री सीमाओं, विशेष रूप से बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में नौसेना की ताकत और खुफिया तंत्र को और अधिक चाक-चौबंद करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में कूटनीतिक वार्ताओं और क्षेत्रीय समझौतों के जरिए यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत अपने इस पड़ोसी मुल्क में तुर्की और अन्य बाहरी ताकतों के बढ़ते दखल को किस तरह से संतुलित करता है और अपनी सुरक्षा को अभेद बनाता है।

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