देश

पैकेज्ड फूड पर फ्रंट पैक वॉर्निंग लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गरमाई बहस, फैसला सुरक्षित; क्या अब पैकेट के आगे छपेगा नमक-चीनी का पूरा सच?

बाजार में बिकने वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में छिपे अधिक नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट के गंभीर स्वास्थ्य खतरों से देश के नागरिकों को सीधे तौर पर सचेत करने के लिए पैकेट के ठीक आगे 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' (Front-of-Pack Labelling – FOPL) अनिवार्य करने की मांग पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपना रुख स्पष्ट करने की तैयारी कर ली है। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य पीठ ने इस संवेदनशील और 140 करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़े जनहित के मुद्दे पर सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रख लिया है। शीर्ष अदालत में दाखिल इस जनहित याचिका (PIL) में यह मांग की गई है कि पैकेट के पीछे बेहद छोटे अक्षरों में लिखे पोषण संबंधी जटिल विवरणों को आम उपभोक्ता ठीक से समझ नहीं पाते, इसलिए पैकेट के बिल्कुल सामने स्पष्ट, बड़े और रंगीन चेतावनी संकेत (Warning Labels) अनिवार्य किए जाएं।

इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं, केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने अपने-अपने पक्ष जोरदार तरीके से रखे। अदालत ने इस बात को गंभीरता से संज्ञान में लिया कि देश में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और पैकेज्ड स्नैक्स का बाजार जिस तेजी से बढ़ा है, उसी अनुपात में बच्चों, युवाओं और वयस्कों में गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय संबंधी गंभीर बीमारियों के मामलों में खतरनाक उछाल आया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद अब समूचे एफएमसीजी (FMCG) उद्योग, खाद्य उत्पादक कंपनियों और उपभोक्ता अधिकार संगठनों की सांसें अटकी हुई हैं क्योंकि अदालत का यह फैसला भारतीय फूड पैकेजिंग के पूरे परिदृश्य को हमेशा के लिए बदलने की ताकत रखता है।

पैकेट के पीछे बारीक अक्षरों में छिपी हकीकत बनाम पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी का सीधा टकराव

वर्तमान में भारत में बिकने वाले अधिकांश चिप्स, बिस्कुट, नूडल्स, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस और फ्रोजन स्नैक्स के पीछे न्यूट्रिशनल वैल्यू (पोषण तालिका) बेहद बारीक अक्षरों में छापी जाती है। इस प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि एक सामान्य उपभोक्ता, ग्रामीण नागरिक या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति यह आसानी से नहीं समझ पाता कि उस उत्पाद में मौजूद सोडियम, कुल शुगर और सैचुरेटेड फैट उसकी दैनिक अनुशंसित सीमा (Daily Recommended Allowance) से कितना ज्यादा है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत में रेखांकित किया कि खाद्य निर्माता कंपनियां इस जटिलता का व्यावसायिक लाभ उठाती हैं और हानिकारक तत्वों से भरपूर उत्पादों को भी आकर्षक विज्ञापनों के जरिए 'हेल्दी' या 'एनर्जी से भरपूर' बताकर बेचती हैं।

याचिका में वैश्विक स्वास्थ्य मानकों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अध्ययनों का हवाला देते हुए मांग की गई है कि भारत में लैटिन अमेरिकी देशों जैसे चिली, मेक्सिको और पेरू की तर्ज पर 'ब्लैक हेक्सागोनल वॉर्निंग लेबल' (काले रंग के चेतावनी चिन्ह) अनिवार्य होने चाहिए। इन चिन्हों में पैकेट के बिल्कुल सामने साफ शब्दों में "उच्च चीनी" (High in Sugar), "उच्च नमक" (High in Salt) या "उच्च वसा" (High in Saturated Fat) लिखा होता है। जब कोई उपभोक्ता सुपरमार्केट की शेल्फ से कोई पैकेट उठाता है, तो उसे पहली ही नजर में यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि वह अपने और अपने बच्चों के शरीर में क्या डालने जा रहा है।

FSSAI का रुख और 'इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग' (INR) बनाम सख्त वॉर्निंग लेबल्स की जंग

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने अपनी प्रगति रिपोर्ट पेश की। एफएसएसआई ने अदालत को अवगत कराया कि वह पैकेज्ड फूड्स के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग नियमों को लागू करने की प्रक्रिया पर काम कर रहा है और इसके लिए विभिन्न हितधारकों, उद्योग प्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ कई दौर का विचार-विमर्श किया जा चुका है। नियामक ने 'इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग' (Indian Nutrition Rating – INR) प्रणाली का प्रस्ताव रखा था, जिसके तहत उत्पादों को स्टार रेटिंग (1 से 5 स्टार) देने की रूपरेखा तैयार की गई थी, ठीक उसी तरह जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर ऊर्जा दक्षता के लिए स्टार दिए जाते हैं।

हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, बाल रोग विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं ने एफएसएसआई की इस स्टार-रेटिंग प्रणाली का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि स्टार रेटिंग भ्रामक हो सकती है क्योंकि कंपनियां कुछ अतिरिक्त पोषक तत्व (जैसे कृत्रिम विटामिन या फाइबर) मिलाकर अस्वास्थ्यकर जंक फूड को भी 3 या 4 स्टार रेटिंग दिलवाने में सफल हो जाएंगी, जिससे उपभोक्ता भ्रमित होंगे। जनहित याचिका में पुरजोर वकालत की गई है कि भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में स्टार रेटिंग के बजाय स्पष्ट और सीधी नकारात्मक चेतावनी (Warning Signs) ही सबसे कारगर उपाय है, ताकि भाषा की समझ न होने पर भी रंग और संकेत देखकर अनपढ़ व्यक्ति भी खतरे को तुरंत भांप सके।

बच्चों और युवाओं में डायबिटीज व मोटापे का विस्फोट: भारत क्यों बन रहा बीमारियों की राजधानी?

चिकित्सा विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठनों ने पैकेज्ड फूड पर सख्त लेबलिंग को आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आपातकालीन जरूरत करार दिया है। भारत को दुनिया की 'डायबिटीज कैपिटल' कहा जाने लगा है और हालिया अध्ययनों के अनुसार देश में 10 करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जबकि करोड़ों लोग प्री-डायबिटिक स्थिति में हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति भारतीय बच्चों की है, जहां पैकेज्ड जंक फूड और मीठे पेयों की अत्यधिक खपत के कारण बचपन में ही मोटापा (Childhood Obesity), फैटी लिवर और उच्च रक्तचाप की समस्याएं तेजी से पांव पसार रही हैं।

जब तक पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग अनिवार्य नहीं होगी, तब तक उपभोक्ता अनजाने में धीमे जहर का सेवन करते रहेंगे। स्कूल-कॉलेजों की कैंटीनों, किराना दुकानों और ऑनलाइन क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर बिकने वाले अधिकांश आकर्षक खाद्य पदार्थ अत्यधिक रिफाइंड कार्ब्स और प्रिजर्वेटिव्स से भरे होते हैं। सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत दलीलों में यह स्पष्ट किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिला 'जीने का अधिकार' (Right to Life) केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक स्वस्थ जीवन और अपने भोजन के बारे में 'जानने का अधिकार' (Right to Know) भी पूरी तरह अंतर्निहित है। नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे जो उत्पाद खरीद रहे हैं, वह उनके शरीर के अंगों पर क्या असर डालेगा।

खाद्य उद्योग (FMCG) की आपत्तियां और सुप्रीम कोर्ट के संभावित फैसले का भविष्य पर असर

दूसरी ओर, पैकेज्ड फूड निर्माता कंपनियों और उद्योग लॉबी ने अदालत में यह तर्क दिया है कि अत्यधिक कड़े चेतावनी लेबल लगाने से भारत के तेजी से बढ़ते फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े कृषि उत्पादों की मांग प्रभावित हो सकती है। उद्योग का कहना है कि सुधारों को क्रमिक रूप से लागू किया जाना चाहिए और कंपनियों को अपनी पैकेजिंग व रेसिपी में बदलाव करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। दोनों पक्षों की इन बेहद जटिल, तीखी और तकनीकी बहसों को सुनने के बाद सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आने वाले ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हैं। यदि अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाती है और केंद्र सरकार व एफएसएसआई को सख्त फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल्स तुरंत लागू करने का आदेश देती है, तो भारत के उपभोक्ता संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास में यह एक युगांतरकारी मोड़ साबित होगा। यह फैसला सीधे तौर पर कंपनियों को अपने उत्पादों में चीनी, नमक और हानिकारक फैट की मात्रा घटाने के लिए मजबूर करेगा, जिससे अंततः भारत के आम नागरिकों की थाली और सेहत अधिक सुरक्षित हो सकेगी।

Back to top button