एजुकेशन

प्रिंसिपल vs एडहॉक: एक ही जैसा काम, फिर भी अधिकारों और सुविधाओं में जमीन-आसमान का अंतर क्यों

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों और यूनिवर्सिटीज से लेकर स्कूलों तक में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले शिक्षकों के बीच का फासला किसी से छिपा नहीं है। कागजों पर भले ही एक शिक्षक का मुख्य काम छात्रों को पढ़ाना और उनका भविष्य गढ़ना हो, लेकिन जब बात प्रशासनिक अधिकारों, छुट्टियों, जॉब सिक्योरिटी और सुविधाओं की आती है, तो 'रेगुलर प्रिंसिपल/टीचर' और 'एडहॉक (Ad-hoc) टीचर' के बीच का फर्क एक गहरी खाई की तरह नजर आता है। सवाल यह उठता है कि जब दोनों ही शिक्षक सामान योग्यता के साथ कक्षा में एक ही तरह की मेहनत करते हैं, तो उनके अधिकारों और सम्मान में इतना बड़ा भेदभाव क्यों है?

योग्यता समान, लेकिन सिस्टम में एडहॉक टीचर्स की मजबूरी

भारतीय शिक्षा प्रणाली में एडहॉक टीचर्स की नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य भले ही शिक्षण संस्थानों में फैकल्टी की कमी को तुरंत पूरा करना रहा हो, लेकिन यह व्यवस्था अब एक स्थाई शोषण का जरिया बनती जा रही है। एक परमानेंट प्रिंसिपल या रेगुलर प्रोफेसर की तरह ही ये एडहॉक शिक्षक भी नेट (NET), पीएचडी (PhD) और तमाम कड़ी परीक्षाओं को पास करके आते हैं। वे इंटरव्यू की उन्हीं प्रक्रियाओं से गुजरते हैं, फिर भी उन्हें हमेशा नौकरी जाने के डर और अनिश्चितता के साए में जीना पड़ता है। उनके पास न तो रेगुलर सैलरी स्ट्रक्चर का पूरा लाभ होता है और न ही मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) या अन्य प्रशासनिक फैसलों में कोई आवाज।

अधिकारों का भारी असंतुलन: फैसले लेने की शक्ति से लेकर छुट्टियों तक का भेद

स्कूलों और कॉलेजों के कामकाज में जहां रेगुलर प्रिंसिपल्स और परमानेंट स्टाफ के पास संस्थान के नीतिगत फैसलों, परीक्षा समितियों और वित्तीय मामलों में हस्ताक्षर करने के पूर्ण अधिकार होते हैं, वहीं एडहॉक टीचर्स इन सब से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें बस अपने लेक्चर लेने और पढ़ाने तक सीमित कर दिया जाता है। इसके अलावा, मेडिकल लीव या गर्मियों-सर्दियों की छुट्टियों के दौरान वेतन कटने जैसी समस्याओं का सामना भी इन्हीं अस्थायी शिक्षकों को करना पड़ता है। एक ही संस्था के भीतर यह वैमनस्य और अधिकारों का असमान वितरण शैक्षणिक माहौल पर भी गहरा मानसिक असर डालता है।

कब खत्म होगा यह भेद और क्या है इस व्यवस्था का समाधान

शिक्षाविदों और छात्र संगठनों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि जब तक एडहॉक कल्चर को पूरी तरह समाप्त कर शिक्षकों का नियमितीकरण (Regularization) नहीं किया जाता, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावों को जमीन पर उतारना मुश्किल होगा। सरकार और यूजीसी (UGC) के स्तर पर कई बार नीतियां बनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में आज भी हजारों शिक्षक एडहॉक के रूप में सिस्टम की चक्की में पिस रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि एक पारदर्शी नीति लाई जाए ताकि जो शिक्षक वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें उनका बनता सम्मान और समान अधिकार मिल सकें।

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