बंगाल में दीदी की बढ़ी मुश्किलें: संकट में घिरीं ममता बनर्जी के सामने कांग्रेस ने रख दी बड़ी शर्त, कहा- ‘मानें अतीत की गलती’

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट और नाटकीय मोड़ से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर विधायकों और सांसदों की बगावत के बाद अपनी ही पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न बचाने का संघर्ष कर रहीं पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब कांग्रेस ने एक बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ममता बनर्जी के सामने एक ऐसी मांग रख दी है जो उन्हें भारी असहजता में डाल सकती है। कांग्रेस ने कहा है कि अगर ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करती हैं कि साल 1997 में कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाना उनकी एक ऐतिहासिक भूल थी, तभी आगामी 21 जुलाई को कांग्रेस के शहीद दिवस मंच पर उनका स्वागत किया जाएगा।
शुभांकर सरकार का सीधा हमला और राजनीतिक प्रायश्चित का दांव
पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष शुभांकर सरकार ने ममता बनर्जी को कोलकाता के शहीद मीनार पर आयोजित होने वाले कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल होने का खुला न्योता तो दिया है, लेकिन उसके साथ एक बेहद तीखी राजनीतिक शर्त जोड़ दी है। शुभांकर सरकार का कहना है कि 21 जुलाई 1993 के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी दी जा सकती है, जब ममता बनर्जी यह स्वीकार करें कि उन्होंने अतीत में एक गलत राजनीतिक फैसला लिया था। कांग्रेस इसे ममता बनर्जी के लिए एक 'राजनीतिक प्रायश्चित' के रूप में देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व के मुताबिक, इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की जगह दीदी को अपनी पुरानी भूल मान लेनी चाहिए, क्योंकि कांग्रेस का मंच उन सभी के लिए खुला है जो अपने राजनीतिक अतीत का सम्मान करते हैं।
जानिए क्या हुआ था 21 जुलाई 1993 को और क्यों है यह ऐतिहासिक विवाद
पश्चिम बंगाल के राजनैतिक इतिहास में 21 जुलाई का दिन बेहद संवेदनशील और खूनी संघर्ष की याद दिलाता है। साल 1993 में इसी तारीख को तत्कालीन यूथ कांग्रेस (Youth Congress) के बैनर तले वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ एक विशाल सचिवालय चलो आंदोलन का आयोजन किया गया था, जिसकी कमान खुद ममता बनर्जी के हाथों में थी। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध फायरिंग में यूथ कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। इसके बाद दिसंबर 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गठन कर लिया। तब से लेकर आज तक ममता बनर्जी इस दिन को टीएमसी की मुख्य वार्षिक रैली के रूप में बड़े पैमाने पर मनाती आ रही हैं, जबकि कांग्रेस हमेशा यह दावा करती रही है कि यह मूल रूप से युवा कांग्रेस का आंदोलन था।
चौतरफा संकट में घिरीं दीदी: बागी गुट और पुलिस की पाबंदी से उलझा मामला
इस वर्ष 21 जुलाई 2026 को होने वाला शहीद दिवस कार्यक्रम ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक वजूद की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट को कोलकाता के एस्प्लेनेड में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास रैली करने की प्रशासनिक हरी झंडी मिल चुकी है, वहीं दूसरी तरफ कोलकाता पुलिस ने ममता बनर्जी के आधिकारिक धड़े को विक्टोरिया हाउस के सामने पारंपरिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह पूरा टकराव अब अदालत के विचाराधीन है। इस बीच बागी गुट ने भी ममता बनर्जी की तरफ एक रणनीतिक पासा फेंकते हुए कहा है कि अगर वह एक 'मार्गदर्शक' के रूप में आना चाहें तो बागी खेमे की रैली में आ सकती हैं, जिससे यह साफ है कि बंगाल की राजनीति में दीदी इस समय अपने सबसे कठिन दौर का सामना कर रही हैं।