देश

बंगाल में दीदी के किले में सेंध लगाना अब भी टेढ़ी खीर, क्या मोदी लहर पर भारी पड़ेगी ममता की जमीनी पकड़?

News India Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल की सत्ता का रास्ता गलियों और गांवों से होकर गुजरता है, जहाँ आज भी ममता बनर्जी का जादू बरकरार नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपनी ताकत कई गुना बढ़ाई है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अभेद्य दुर्ग को ढहाने की राह अब भी कांटों भरी है। चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि ‘मिशन बंगाल’ को फतह करने के लिए भाजपा को केवल रैलियों की नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की लोकलुभावन योजनाओं के काट की जरूरत है।संगठनात्मक ढांचा: जहाँ TMC से पिछड़ रही है भाजपाबंगाल की राजनीति का कड़वा सच यह है कि यहाँ चुनाव केवल मुद्दों पर नहीं, बल्कि मजबूत बूथ मैनेजमेंट पर जीते जाते हैं। ममता बनर्जी के पास हर गांव और ब्लॉक स्तर पर कैडरों की एक लंबी फौज है। इसके उलट, भाजपा ने भले ही दिल्ली से पूरी ताकत झोंक दी हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसके पास आज भी वैसे कद्दावर चेहरों की कमी है जो ममता के सीधे मुकाबले में खड़े हो सकें। बूथ स्तर पर टीएमसी की यह पकड़ भाजपा के लिए अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।’लक्ष्मी भंडार’ और महिला वोट बैंक: ममता का सबसे बड़ा हथियारममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने बंगाल की महिलाओं के बीच उनकी स्थिति को बेहद मजबूत कर दिया है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग ममता को अपनी ‘बड़ी दीदी’ के रूप में देखता है। भाजपा ने भ्रष्टाचार और संदेशखाली जैसे मुद्दों को उठाकर ममता सरकार को घेरने की कोशिश तो की है, लेकिन सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ पाने वाला बड़ा तबका आज भी टीएमसी के साथ खड़ा नजर आता है। यही ‘साइलेंट वोटर’ भाजपा के विजय रथ को रोकने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।हिंदुत्व कार्ड बनाम बंगाली अस्मिता की जंगभाजपा ने बंगाल में हिंदुत्व और ध्रुवीकरण के जरिए बढ़त बनाने की कोशिश की है, लेकिन ममता बनर्जी ने इसे ‘बंगाली अस्मिता’ (बंगाली गौरव) बनाम ‘बाहरी’ की लड़ाई बनाकर पलटवार किया है। रविंद्रनाथ टैगोर और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसी विभूतियों की विरासत को अपनी राजनीति से जोड़कर ममता ने खुद को बंगाल की संस्कृति के रक्षक के तौर पर स्थापित कर लिया है। भाजपा के लिए इस ‘सांस्कृतिक कवच’ को तोड़ पाना फिलहाल मुश्किल साबित हो रहा है।क्या 2026 में बदलेंगे समीकरण? दिल्ली की नजरें बंगाल परभले ही भाजपा के लिए राह कठिन है, लेकिन पार्टी ने हार नहीं मानी है। गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा लगातार बंगाल का दौरा कर संगठन में नई जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा की रणनीति अब उन सीटों पर ध्यान केंद्रित करने की है जहाँ पिछली बार हार का अंतर कम था। राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर भाजपा स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने और बंगाली समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में सफल रहती है, तभी ममता के किले में सेंध लग पाएगी।

Back to top button