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मनोज बाजपेयी ने संघर्ष के दम पर खड़ा किया 170 करोड़ का शानदार साम्राज्य, सब कुछ हासिल करने के बाद भी सता रहा बड़ा मलाल

भारतीय सिनेमा जगत में अपनी दमदार अदायगी, अनूठे अभिनय कौशल और हर किरदार में जान फूंक देने वाले पद्मश्री मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) की सफलता की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर मायानगरी मुंबई की चकाचौंध में अपनी मेहनत के बल पर अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बनाने वाले मनोज बाजपेयी ने आज अभिनय की दुनिया में जो मुकाम हासिल किया है, वह हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के समय में अपनी फिल्मों, ओटीटी प्रोजेक्ट्स और ब्रांड विज्ञापनों के जरिए उन्होंने लगभग 170 करोड़ रुपये का एक बड़ा और मजबूत वित्तीय साम्राज्य खड़ा कर लिया है। उनकी शान-ओ-शौकत और स्टारडम किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन इसके बावजूद जब वे अपनी जिंदगी के सफर को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उनके मन में एक ऐसा गहरा मलाल रह जाता है जो आज भी उन्हें अंदर से झकझोर देता है।

थिएटर के दिनों का संघर्ष और मायानगरी मुंबई का कठिन सफर

मनोज बाजपेयी के जीवन का शुरुआती दौर बिल्कुल भी आसान नहीं था। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में बार-बार अस्वीकार किए जाने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने अभिनय के जूनून को कम नहीं होने दिया। जब वे दिल्ली से मुंबई आए थे, तब उनके पास रहने के लिए ढंग का ठिकाना नहीं था और कई दिनों तक उन्हें बिना पैसों के खाली पेट सोना पड़ता था। 'बैंडिट क्वीन' और 'सत्या' जैसी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदारों से अपनी शुरुआत करने वाले इस अभिनेता ने अपनी काबिलियत के दम पर साबित कर दिया कि एक दिन पूरी इंडस्ट्री उनके इर्द-गिर्द घूमेगी। 'द फैमिली मैन' और विभिन्न समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाकर उन्होंने दिखा दिया कि सिनेमा में स्टारडम सिर्फ बड़े बैनर से नहीं, बल्कि बेजोड़ अभिनय से तय होता है।

170 करोड़ के साम्राज्य के मालिक बनने के बाद भी क्यों है अधूरापन?

आज मनोज बाजपेयी के पास नाम, दौलत, शोहरत और देश-विदेश में करोड़ों फैंस का प्यार है, लेकिन कहते हैं न कि इंसान की जिंदगी में सब कुछ मिलने के बाद भी कोई न कोई अधूरापन रह ही जाता है। मीडिया इंटरव्यूज और बातचीत के दौरान जब उनसे उनके जीवन के सबसे बड़े दर्द या मलाल के बारे में पूछा जाता है, तो उनका दिल भर आता है। अभिनेता का यह मानना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में सफलता की सीढ़ियां तब चढ़नी शुरू कीं जब उनके माता-पिता इस दुनिया में उनके साथ नहीं थे। आज वे चाहे जितने आलीशान घरों में रहें या कितनी भी महंगी गाड़ियों के मालिक बन जाएं, लेकिन वे अपने माता-पिता को अपनी इस सफलता का गवाह नहीं बना सके, और यही एक ऐसा मलाल है जो उनके दिल में हमेशा के लिए घर कर गया है।

अपने माता-पिता को सफलता न दिखा पाने का सबसे बड़ा गम

मनोज बाजपेयी कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख यही है कि जब वे संघर्ष कर रहे थे, तब उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत सी तकलीफों में देखा था। लेकिन जैसे ही उनके जीवन में अच्छे दिन आए और वे अपने परिवार को एक आरामदायक और खुशहाल जिंदगी देने की स्थिति में पहुंचे, उनके माता-पिता इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। अभिनेता अक्सर यह कहते हैं कि वे चाहते थे कि उनके पिता और माता उनकी सफलता, उनके पुरस्कारों और उनकी इस शान-ओ-शौकत को अपनी आंखों से देखें। पैसों और भौतिक सुख-सुविधाओं से भले ही आज उनका साम्राज्य 170 करोड़ के पार पहुंच गया हो, लेकिन माता-पिता के आशीर्वाद को भौतिक चीजों से नहीं तोला जा सकता, और यही कमी उन्हें ताउम्र खलती रहेगी।

नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए क्या संदेश छोड़ते हैं मनोज बाजपेयी?

मनोज बाजपेयी का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि यदि आपके भीतर प्रतिभा है और आप लगातार मेहनत करने का जज्बा रखते हैं, तो विपरीत से विपरीत परिस्थितियां भी आपको रोक नहीं सकतीं। उनका जीवन यह सिखाता है कि सफलता केवल बैंक बैलेंस या संपत्ति बनाने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों के खोने की कीमत पर मिलने वाली दौलत के अपने कुछ दर्द भी होते हैं। आज के युवा कलाकार जो रातों-रात स्टार बनने का सपना देखते हैं, वे मनोज बाजपेयी के इस सफर से यह सीख ले सकते हैं कि धैर्य और समर्पण ही असली पूंजी है। करोड़ों के साम्राज्य के मालिक होने के बावजूद जमीन से जुड़े रहना और अपनी जड़ों को न भूलना ही एक सच्चे कलाकार की सबसे बड़ी पहचान होती है।

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