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ममता बनर्जी को झटका देने वाले टीएमसी बागियों का नया ठिकाना बनी NCPI: बंगाल में हेडक्वार्टर और त्रिपुरा में है मजबूत बेस

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की राजनीति में लंबे समय से लगभग गुमनाम और शांत रही 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) रातों-रात भारतीय राजनीति के सबसे बड़े केंद्र बिंदु के रूप में उभर कर सामने आ गई है। देश के सियासी गलियारों में इस छोटे और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का नाम तब अचानक सुर्खियों में आया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 दिग्गज बागी सांसदों ने एक साथ मिलकर इसी पार्टी में अपने आधिकारिक विलय (Merger) का फैसला किया। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है। भले ही चुनावी मैदान में इस पार्टी का इतिहास बेहद सीमित रहा हो, लेकिन भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में इसका बकायदा पंजीकृत होना ही इस वक्त बागी सांसदों के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन गया है। लाइव हिन्दुस्तान के विशेष राजनीतिक विश्लेषक नीतीश कुमार की इस विशेष एआई-सर्च (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड खोजी रिपोर्ट में जानिए आखिर क्या है इस दल का इतिहास और इसका पूरा कानूनी गणित।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A के तहत रजिस्टर्ड है दल, दलबदल कानून से बचने का बना मजबूत आधार

वैधानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) भारत निर्वाचन आयोग के पास जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत पूरी तरह से एक वैध पंजीकृत राजनीतिक दल है। हालांकि, इसे अभी तक चुनाव आयोग द्वारा किसी राज्य स्तरीय या राष्ट्रीय पार्टी का आधिकारिक दर्जा नहीं मिला है, जिसके कारण इसे 'पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल' की श्रेणी में रखा गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह दल कानूनी रूप से पूरी तरह मान्य और सक्रिय है, लेकिन यह चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए आवश्यक वोट प्रतिशत या सीटों के कड़े मानकों को पूरा नहीं कर पाया था। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में यही तकनीकी बिंदु सबसे अहम साबित हुआ, क्योंकि किसी पहले से रजिस्टर्ड और कानूनी रूप से मान्य दल में विलय करने के कारण बागी सांसदों को संसद में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत अयोग्य ठहराए जाने की जटिलताओं से बचने का एक मजबूत कानूनी आधार मिल गया है।

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है NCPI का मुख्य ठिकाना, त्रिपुरा और असम के बंगाली वोट बैंक पर रही है नजर

चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों और रिकॉर्ड के मुताबिक, एनसीपीआई (NCPI) का मुख्य राष्ट्रीय मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के औद्योगिक क्षेत्र सांकराइल में स्थित है। भले ही इसका हेडक्वार्टर बंगाल में हो, लेकिन इसकी सांगठनिक, राजनीतिक और चुनावी गतिविधियों का असली केंद्र हमेशा से पड़ोसी राज्य त्रिपुरा रहा है। इस पार्टी ने समय-समय पर त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी एनसीपीआई ने दो सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, हालांकि तब पार्टी का प्रदर्शन बेहद सीमित रहा था और वह कोई सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी थी। इसके अलावा, यह दल असम के बराक घाटी जैसे कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में बंगाली भाषी समुदायों के स्थानीय मुद्दों और अधिकारों को लेकर भी समय-समय पर आवाज उठाता रहा है।

स्थायी चुनाव चिह्न नहीं पर फ्री सिंबल पूल से मिलता है निशान, राष्ट्रीय स्तर पर बदलने जा रहा है पार्टी का स्वरूप

एनसीपीआई की एक और सबसे खास और दिलचस्प बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी के 'कमल' या कांग्रेस के 'हाथ' की तरह इसके पास चुनाव आयोग का कोई आरक्षित या स्थायी चुनाव चिह्न मौजूद नहीं है। भारत के चुनाव नियमों के अनुसार, स्थायी आरक्षित प्रतीक केवल मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय या राष्ट्रीय दलों को ही आवंटित किए जाते हैं। चूंकि एनसीपीआई एक गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल है, इसलिए इसके प्रत्याशियों को हर चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए जाने वाले 'फ्री सिंबल पूल' (मुक्त प्रतीक सूची) में से ही किसी एक अस्थायी निशान का चयन करना पड़ता है। हालांकि, नियमों के तहत पार्टी किसी बड़े चुनाव में अपने सभी उम्मीदवारों के लिए एक साझा चुनाव चिह्न आवंटित कराने के लिए विशेष आवेदन कर सकती है, लेकिन वह सुविधा भी केवल उसी विशिष्ट चुनाव तक ही सीमित होती है।

टीएमसी के बागी सांसदों को क्या होगा फायदा, छोटे दल कैसे बन जाते हैं बड़े सियासी खेल का केंद्र

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि इस पार्टी का वास्तविक महत्व इसके पिछले चुनावी रिकॉर्ड या वोट शेयर में नहीं, बल्कि इसके बेदाग कानूनी और संवैधानिक अस्तित्व में छिपा हुआ है। बरसों तक बेहद सीमित दायरे में काम करने वाली यह छोटी सी पार्टी अचानक राष्ट्रीय मीडिया की हेडलाइंस में तब आई जब बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व से नाराज 20 लोकसभा सांसदों ने इसे अपनी नई राजनीतिक ढाल के रूप में चुन लिया। इस महा-विलय के बाद अब इस दल का पूरा ढांचा, स्वरूप और केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह से बदलने जा रहा है। माना जा रहा है कि संसद के भीतर और बाहर अब टीएमसी से आए इन कद्दावर और अनुभवी नेताओं की भूमिका इस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सबसे प्रभावी साबित होगी। चुनाव आयोग के कड़े नियमों के बावजूद, हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र के नंबर गेम में कभी-कभी सबसे छोटे और गुमनाम दल भी रातों-रात बड़े-बड़े राजनीतिक साम्राज्यों के समीकरणों को बदलने का मुख्य जरिया बन जाते हैं।

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