महाभारत की नारायणी सेना का रहस्य क्यों कौरवों की ओर से लड़े भगवान कृष्ण के योद्धा?10 लाख सैनिकों का था ये चक्रव्यूह

News India Live, Digital Desk: कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब धर्म और अधर्म का महायुद्ध छिड़ा, तो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना ‘नारायणी सेना’ ने कौरवों का साथ दिया। यह वही सेना थी जिसे स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने तैयार किया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साक्षात विष्णु के अवतार कृष्ण के होते हुए भी उनकी अपनी सेना पांडवों के विरुद्ध क्यों खड़ी थी? इतिहास के पन्नों में दर्ज यह घटना न केवल रणनीतिक कौशल का उदाहरण है, बल्कि यह वचन और धर्म की उस परीक्षा की कहानी भी है, जिसने महाभारत के युद्ध का परिणाम तय कर दिया था।अर्जुन और दुर्योधन की होड़: कृष्ण ने दी थी दो शर्तेंयुद्ध की घोषणा के बाद जब सहायता मांगने के लिए अर्जुन और दुर्योधन द्वारका पहुंचे, तब श्री कृष्ण निद्रा में थे। जागने के बाद उन्होंने दोनों के सामने दो विकल्प रखे: एक तरफ वे स्वयं होंगे (लेकिन शस्त्र नहीं उठाएंगे) और दूसरी तरफ उनकी अजेय ‘नारायणी सेना’ होगी। अर्जुन ने बिना क्षण गंवाए निहत्थे कृष्ण को चुना, जबकि दुर्योधन ने विशाल सेना पाकर खुद को भाग्यशाली समझा। इसी चुनाव ने तय कर दिया कि पांडवों के पास ‘विजय का मार्ग’ (कृष्ण) होगा और कौरवों के पास केवल ‘संख्या बल’ (सेना)।क्या थी ‘अक्षौहिणी’ सेना? समझें चतुरंगिणी बल का गणितभगवान कृष्ण की नारायणी सेना एक ‘अक्षौहिणी’ सेना थी, जो प्राचीन काल की सबसे बड़ी सैन्य इकाई मानी जाती थी। इसे ‘चतुरंगिणी’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि इसमें चार प्रमुख अंग शामिल थे: हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक। शास्त्रों के अनुसार, एक अक्षौहिणी सेना में 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते थे। कुल मिलाकर 10 लाख से भी अधिक योद्धाओं का यह समूह इतना शक्तिशाली था कि इसे हराना किसी भी योद्धा के लिए लगभग असंभव माना जाता था।भीष्म और द्रोण भी थे इस सेना के कौशल के कायलकौरवों की 11 अक्षौहिणी सेना में नारायणी सेना सबसे घातक टुकड़ी थी। इसमें ‘अंधक’ और ‘वृष्णि’ जैसे वीर यादव कुलों के योद्धा शामिल थे। इस सेना का नेतृत्व स्वयं कृतवर्मा जैसे महारथी कर रहे थे। युद्ध के दौरान इस सेना ने पांडवों की सेना को भारी क्षति पहुँचाई थी। हालांकि, कृष्ण के रणनीतिक मार्गदर्शन और अर्जुन के गांडीव के आगे अंततः यह विशाल बल भी टिक नहीं सका। यह कथा हमें सिखाती है कि साधन चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, यदि साध्य और सारथी सही न हों, तो पराजय निश्चित है।