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महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा देना भेदभाव है, केरलम हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कही यह बड़ी बात

केरलम में हाल ही में लागू की गई 'प्रियदर्शिनी योजना' (Priyadarshini Scheme), जिसके तहत महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को केएसआरटीसी (KSRTC) की सामान्य बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है, अब कानूनी चर्चाओं के केंद्र में है। इस योजना को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केरलम हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन किया है। कोर्ट ने साफ तौर पर माना कि यह सुविधा सरकार द्वारा चुनाव के दौरान किए गए अपने वादों का पालन करने का एक ठोस कदम है।

चुनावी वादा बनाम संवैधानिक अधिकार

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वीएम की पीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार के इस नीतिगत फैसले को कामकाजी महिलाओं के उत्थान के लिए जरूरी बताया। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, "यह सराहनीय है कि सरकार ने कम से कम अपना चुनावी वादा तो पूरा किया है।" याचिकाकर्ता मुहम्मद फिरदौज की ओर से पेश हुए अधिवक्ता शमीम अहमद एमपी ने दलील दी कि यह योजना भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन करती है। उनका तर्क था कि बिना किसी आय सीमा या आवासीय योग्यता के सबको मुफ्त यात्रा देना अनुचित है।

अन्य राज्यों का दिया गया उदाहरण

सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने अपना बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी जन-कल्याणकारी योजनाएं पहले से ही देश के कई अन्य राज्यों में सफलतापूर्वक चल रही हैं। सरकार ने दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और बंगाल का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां भी महिलाओं के लिए समान मुफ्त बस यात्रा योजनाएं लागू हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं की गतिशीलता (Mobility) और कार्यबल में भागीदारी बढ़ाना है। सरकार के इन तर्कों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें दर्ज कीं और इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

योजना पर मचा सियासी और कानूनी शोर

प्रियदर्शिनी योजना को लेकर दायर यह याचिका इस बात पर बहस छेड़ती है कि क्या जन-कल्याणकारी योजनाओं में दी जाने वाली छूट को 'भेदभाव' की श्रेणी में रखा जा सकता है? याचिकाकर्ता का कहना है कि इसके लिए एक स्पष्ट मापदंड होना चाहिए, जबकि सरकार का पक्ष है कि यह कामकाजी महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज की मुख्यधारा में लाने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का एक माध्यम है। फिलहाल पूरे राज्य की नजरें केरलम हाईकोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं, जो भविष्य में इस तरह की लोक-लुभावन नीतियों के लिए एक मिसाल बन सकता है।

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