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राम मंदिर चंदा चोरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेहद सख्त टिप्पणी, कहा- ‘जिन्हें इससे फर्क नहीं पड़े, उन्हें दुनिया की कोई चीज शर्मिंदा नहीं कर सकती’

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और प्रशासनिक व्यवस्था पर बेहद कड़ी और बेबाक टिप्पणियां की हैं। एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जिस समाज में राम मंदिर जैसी पवित्र जगह पर चंदे की चोरी और हेराफेरी जैसी घटनाएं होने पर भी लोग बेपरवाह रहते हैं, वहां अब किसी भी चीज से शर्मिंदा होने की गुंजाइश नहीं बचती। कोर्ट ने भ्रष्टाचार को समाज में सामान्य मान लिए जाने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है और इसे दीमक की तरह खतरनाक बताया है।

राम मंदिर चंदे की चोरी पर अदालत का कड़ा रुख

अयोध्या के राम मंदिर में मिले दान और चंदे की चोरी के मामले का जिक्र करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अपने 51 पन्नों के विस्तृत फैसले में तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में दान की चोरी का मामला तो सारी हदें पार कर चुका है। यदि ऐसी पावन जगहों पर होने वाली चोरियां भी लोगों को झकझोर या शर्मिंदा नहीं कर सकतीं, तो फिर दुनिया की कोई भी घटना उन्हें शर्मिंदा नहीं कर सकती। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज में ईमानदारी का स्तर किस हद तक गिर चुका है।

'जब तक कोई पकड़ा न जाए, तब तक भ्रष्टाचार गलत नहीं'

अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत के आम जनमानस ने अब भ्रष्टाचार को एक सामान्य बात मान लिया है। लोग तब तक किसी कार्य को गलत नहीं मानते जब तक कि कोई रिश्वतखोर रंगे हाथों पकड़ा न जाए। ट्रांसपेरेंसी International की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि 182 देशों की सूची में भारत का 91वें स्थान पर होना भी हमारी अंतरात्मा को झकझोरने के लिए काफी नहीं है। देश में बढ़ते बेलगाम भ्रष्टाचार से कुछ ही लोगों के हाथ में अकूत संपत्ति एकत्र हो रही है, जिससे अमीर और गरीब की खाई चौड़ी हो रही है। इस स्थिति पर लगाम लगाने के लिए कोर्ट ने 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' में संशोधन कर दोषियों को फांसी की सजा तक देने का गंभीर सुझाव दिया है।

'बुलडोजर जस्टिस' और अवैध निर्माण पर हाईकोर्ट की दो टूक

यह पूरा फैसला सरकार के बुलडोजर एक्शन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें पीठ के दोनों जजों की राय अलग-अलग रही थी। 'बुलडोजर जस्टिस' पर बात करते हुए अदालत ने कहा कि अपराध के तुरंत बाद मकान ढहा देना समाज की उस 'खून की प्यास' को शांत करने जैसा है जो इस अवैध संस्कृति से पक चुकी है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद धड़ल्ले से तोड़फोड़ जारी है।

अदालत ने यह भी जोड़ा कि कोई भी अवैध इमारत रातों-रात खड़ी नहीं होती। इसके पीछे अधिकारियों की मिलीभगत और भारी रिश्वतखोरी होती है। लेकिन इसका खामियाजा दशकों बाद उस निर्दोष फ्लैट या मकान खरीदार को भुगतना पड़ता है जिसे बिना नोटिस बेघर होना पड़ता है। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी अवैध इमारतों को बिजली-पानी जैसी सरकारी सुविधाएं मुहैया कराकर शासन-प्रशासन भी इस अपराध में बराबर का भागीदार बन जाता है।

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