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मिसाइलों के बाद अब ईरान की अर्थव्यवस्था पर हमला, ट्रंप की रणनीति कितनी कारगर?

सैन्य झड़पों और मिसाइल हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान को रणनीतिक रूप से बैकफुट पर लाने के लिए अपना सबसे बड़ा हथियार—आर्थिक नाकाबंदी और वित्तीय प्रतिबंध (Maximum Pressure)—का इस्तेमाल पूरी ताकत से शुरू कर दिया है। वाशिंगटन का उद्देश्य केवल प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि 'डॉलर की किल्लत' और व्यापारिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाकर उसे बिना किसी बड़े युद्ध के समझौते की मेज पर आने या अपनी क्षेत्रीय व परमाणु नीतियों को बदलने के लिए मजबूर करना है।

अमेरिका का 'आर्थिक युद्ध' और रियाल में फ्री-फॉल

अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के बैंकिंग सेक्टर, तेल निर्यात के अवैध रास्तों (Shadow Fleet), डिजिटल एसेट एक्सचेंज और तेल व्यापार से जुड़े मध्यस्थों पर लगातार नए कड़े प्रतिबंध आयद किए हैं। इस रणनीति के कारण ईरान के भीतर अमेरिकी डॉलर की भारी किल्लत हो गई है, जिससे ईरानी मुद्रा 'रियाल' (Rial) ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गिरी है।

ईरान की बैंकिंग प्रणाली में एक बड़े बैंक के वित्तीय संकट में फंसने और केंद्रीय बैंक द्वारा बेतहाशा नोट छापे जाने के बाद देश में मुद्रास्फीति (Inflation) चरम पर पहुंच गई है। दैनिक उपयोग की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे तेहरान समेत कई बड़े शहरों में आम जनता सड़कों पर उतर आई है।

डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति: कितनी कारगर?

अमेरिकी रणनीति का मुख्य खाका 4 प्रमुख स्तंभों पर टिका है:

  • रणनीतिक समर्पण (Strategic Submission): इसका उद्देश्य शासन बदलना नहीं, बल्कि ईरान की आर्थिक रीढ़ तोड़कर उसे ऐसा समझौता करने पर मजबूर करना है जिसमें परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी रोक और क्षेत्रीय गुटों को वित्तपोषण बंद करना शामिल हो।

  • तिहरे व्यापारिक प्रतिबंध: ईरान से तेल खरीदने या वित्तीय सांठ-गांठ करने वाले तीसरे देशों पर 25 प्रतिशत तक के अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी देकर अमेरिका ने ईरान के आर्थिक मददगारों को भी पीछे हटने पर मजबूर किया है।

  • आंतरिक अशांति का फायदा: आर्थिक तंगी से जब जनता परेशान होकर सड़कों पर उतरती है, तो ईरानी शासन पर दोहरा दबाव (आंतरिक विरोध और बाहरी प्रतिबंध) बनता है।

  • मोलभाव का दरवाजा खुला रखना: कड़े प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका ने हमेशा बातचीत और नए सौदे (Deal) का विकल्प खुला रखा है, जिससे ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद पैदा किए जा सकें।

क्या हैं इस रणनीति के बड़े जोखिम और सीमाएं?

हालांकि, कागज पर यह रणनीति बेहद प्रभावी दिखती है, लेकिन इसके अपने गंभीर वैश्विक और रणनीतिक जोखिम भी हैं:

  • वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल: ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह से रोकने और हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जिससे अमेरिका और यूरोप में फिर से महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा होती है।

  • चीन और 'ग्रे मार्केट' का सहारा: अमेरिका के कड़े रुख के बावजूद ईरान अपने तेल का बड़ा हिस्सा चीन और अनधिकृत 'शैडो फ्लीट' के जरिए बेचने में सक्षम रहा है, जिससे अमेरिकी आर्थिक दबाव का असर कुछ हद तक कम हो जाता है।

  • ईरान का पलटवार और क्षेत्रीय अस्थिरता: जब किसी देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से दीवारों से घेर दिया जाता है, तो उसके द्वारा खाड़ी के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर या समुद्री व्यापारिक मार्गों को बाधित करने का जोखिम काफी बढ़ जाता है।

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