उत्तर प्रदेश

यूपी में ₹107 प्रति किलो पहुंची CNG: लखनऊ-आगरा में ग्रीन गैस लिमिटेड ने बढ़ाए दाम, ऑटो-कैब चालकों और आम जनता का बजट बिगड़ा

उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में वाहन चालकों और आम जनता को महंगाई की एक और तगड़ी मार झेलनी पड़ी है। राज्य में सिटी गैस वितरण का काम संभाल रही प्रमुख कंपनी ग्रीन गैस लिमिटेड (GGL)—जो इंडियन ऑयल और गेल की संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है—ने सीएनजी की खुदरा कीमतों में 2 रुपये से लेकर 3.25 रुपये प्रति किलोग्राम तक की भारी बढ़ोतरी कर दी है। इस ताजा संशोधन के बाद राजधानी लखनऊ और ताजनगरी आगरा में सीएनजी के दाम 105 रुपये से उछलकर सीधे 107 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए हैं। वहीं उन्नाव में यह कीमत 103.75 रुपये प्रति किलो और अयोध्या व सुल्तानपुर में 3.25 रुपये की अधिकतम बढ़ोतरी के साथ 105 रुपये प्रति किलो के स्तर को छू चुकी है। जहां एक तरफ मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोग पेट्रोल-डीजल की महंगाई से बचने के लिए सीएनजी वाहनों का रुख कर रहे थे, वहीं अब सीएनजी के ₹100 के पार चले जाने से उनके घरेलू बजट का पूरा गणित बिगड़ गया है।

पेट्रोल के करीब पहुंची सीएनजी: क्या अब भी बचा है 'इकोनॉमिकल' विकल्प होने का फायदा?

कुछ वर्ष पहले तक सीएनजी को पेट्रोल और डीजल की तुलना में 40 से 50 प्रतिशत तक किफायती ईंधन माना जाता था, लेकिन मौजूदा मूल्य वृद्धि ने इस अंतर को लगभग खत्म कर दिया है। उत्तर प्रदेश में इस समय पेट्रोल की कीमत लगभग 95 से 97 रुपये प्रति लीटर के आसपास है, जबकि सीएनजी अब 107 रुपये प्रति किलोग्राम पर बिक रही है। भले ही माइलेज के मामले में सीएनजी थोड़ा बेहतर प्रदर्शन देती हो, लेकिन सीएनजी किट लगवाने का खर्च, वाहन की बूट स्पेस में सिलेंडर की परेशानी और पंपों पर घंटों लगने वाली लंबी कतारों के बाद मिलने वाले आर्थिक फायदे में अब नाममात्र का अंतर रह गया है। कार खरीदारों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या भारी-भरकम पूंजी लगाकर नई सीएनजी गाड़ी खरीदना समझदारी का फैसला है या फिर हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर रुख करना ही बेहतर विकल्प है।

ऑटो-रिक्शा, कैब चालकों और डिलीवरी पार्टनर्स की आजीविका पर सीधा प्रहार

सीएनजी की इस अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि का सबसे क्रूर प्रभाव दैनिक आजीविका कमाने वाले ऑटो-रिक्शा चालकों, ऐप-आधारित टैक्सी (Ola/Uber) ड्राइवरों और क्विक-कॉमर्स डिलीवरी एजेंट्स पर पड़ा है। लखनऊ के चारबाग, हजरतगंज, आलमबाग और गोमती नगर से लेकर आगरा के एमजी रोड और कैंट रेलवे स्टेशन जैसे व्यस्त इलाकों में चलने वाले ऑटो चालकों का कहना है कि उनकी रोजाना की कमाई में 100 से 150 रुपये की सीधी कटौती हो जाएगी। ऐप-बेस्ड कंपनियों द्वारा यात्री किरायों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाती, जिसका पूरा नुकसान ड्राइवरों को अपनी जेब से भरना पड़ता है। दूसरी ओर, यदि स्थानीय ऑटो चालक निजी तौर पर सवारियों से किराया बढ़ाते हैं, तो यात्रियों के साथ रोज-रोज की तू-तू मैं-मैं और विवाद की स्थिति पैदा होती है। कमर्शियल पिकअप वैन और छोटे लोडिंग वाहनों का खर्च बढ़ने से शहरों में फल, सब्जियां, किराना और पार्सल डिलीवरी भी महंगी होने की आशंका गहरा गई है।

आखिर क्यों बढ़ रहे हैं सीएनजी के दाम? जानिए पर्दे के पीछे के आर्थिक कारण

ग्रीन गैस लिमिटेड और ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, इस मूल्य वृद्धि के पीछे मुख्य वजह इनपुट गैस की लागत में भारी इजाफा है। केंद्र सरकार द्वारा सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूटर्स (CGD) को घरेलू प्राकृतिक गैस यानी एडमिनिस्टर्ड प्राइसिंग मैकेनिज्म (APM) के तहत मिलने वाले सस्ते गैस कोटे में लगातार कटौती की जा रही है। घरेलू सस्ती गैस की उपलब्धता कम होने के कारण गैस कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगी स्पॉट एलएनजी (Spot LNG) आयात करनी पड़ रही है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की चाल ने आयातित गैस की लैंडिंग लागत को काफी महंगा कर दिया है। चूंकि कंपनियों की खरीद लागत बढ़ गई है, इसलिए वे इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को सीधे खुदरा उपभोक्ताओं की जेब पर स्थानांतरित कर रही हैं।

जीएसटी (GST) से बाहर होने और भारी वैट (VAT) का टैक्स जाल

सीएनजी के 107 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने का दूसरा सबसे बड़ा तकनीकी कारण इसका टैक्स स्ट्रक्चर है। प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पाद अभी तक जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) के दायरे में नहीं लाए गए हैं। इसका नतीजा यह है कि केंद्र सरकार इस पर एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जबकि उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्य सरकारें इस पर भारी वैट (VAT) और स्थानीय चुंगी/उपकर लगाती हैं। टैक्स पर टैक्स (कैस्केडिंग इफेक्ट) लगने के कारण दिल्ली (जहां वैट की दरें अपेक्षाकृत अलग हैं) के मुकाबले उत्तर प्रदेश के शहरों में सीएनजी की कीमतें हमेशा 10 से 15 रुपये प्रति किलो अधिक रहती हैं। उपभोक्ता और व्यापारी संगठन लगातार मांग कर रहे हैं कि प्राकृतिक गैस को तुरंत जीएसटी के दायरे में लाया जाए ताकि पूरे देश में 'एक राष्ट्र, एक दर' लागू हो सके और आम नागरिकों को इस भारी टैक्स के बोझ से स्थायी राहत मिल सके।

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