राजधानी में आधी रात का रुदन: इंडिया गेट की छांव में इंसाफ मांगते अंकिता के बूढ़े मां-बाप

देश के लोकतंत्र के दिल कहे जाने वाले नई दिल्ली के इंडिया गेट और कर्तव्य पथ के चौड़े गलियारों ने बीती रात दर्द, बेबसी और व्यवस्था के खिलाफ एक मां-बाप के असीम संघर्ष का वो मंजर देखा, जिसने हर संवेदनशील नागरिक की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की 19 वर्षीय बेटी अंकिता भंडारी, जिसकी चीत्कारें सितंबर 2022 में चीला नहर की खामोश गहराइयों में दफन कर दी गई थीं, उसके बुजुर्ग पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी और मां सोनी देवी न्याय की गुहार लगाते हुए सीधे देश की सत्ता के केंद्र में आ पहुंचे। हाथ में बेटी की हंसती हुई तस्वीर, गले में 'जस्टिस फॉर अंकिता' की तख्तियां और आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए यह लाचार परिवार बुधवार की देर रात इंडिया गेट के स्मारक के सामने खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठ गया। उनके साथ दिल्ली के विश्वविद्यालयों के कई छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और उत्तराखंड के प्रवासी समाज के लोग भी मोमबत्तियां जलाकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करने लगे। राजधानी की ठंडी हवा के बीच जब मां सोनी देवी फफक-फफक कर बोलीं कि 'दो साल बीत गए, लेकिन मेरी बेटी के असली हत्यारे और उस सफेदपोश वीआईपी का नाम आज तक क्यों छिपाया जा रहा है?', तो कर्तव्य पथ पर सुरक्षा ड्यूटी में तैनात जवानों के कदम भी कुछ पलों के लिए ठिठक गए।
भोर में 4 बजे पुलिस का एक्शन: धरनास्थल से जबरन हटाया, थाने में हिरासत और दोपहर में रिहाई
रात के अंधेरे में शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ यह धरना जैसे-जैसे सुबह के पहर में दाखिल हुआ, दिल्ली पुलिस का सुरक्षा अमला हरकत में आ गया। चूंकि इंडिया गेट और उसके आसपास का पूरा कर्तव्य पथ इलाका धारा 144 के तहत हाई-सिक्योरिटी नो-प्रोटेस्ट जोन में आता है, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों को आशंका थी कि सुबह होते ही यहां हजारों की तादाद में लोगों का हुजूम जमा हो सकता है। भोर के लगभग 4 बजे, जब प्रदर्शनकारी थके-हारे जमीन पर बैठे थे, तभी दिल्ली पुलिस के दर्जनों जवानों और महिला पुलिसकर्मियों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी। पुलिस अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से लाउडस्पीकर पर इलाका खाली करने की अपील की, लेकिन अंकिता के माता-पिता ने साफ कह दिया कि जब तक उन्हें देश के शीर्ष नेतृत्व से मिलने का आश्वासन नहीं मिलता, वे यहां से एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद पुलिस ने बलपूर्वक कार्रवाई करते हुए अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी, मां सोनी देवी और उनके साथ मौजूद दर्जनों समर्थकों को हिरासत में ले लिया। उन्हें जबरन दिल्ली पुलिस की बसों में बैठाकर नई दिल्ली जिले के मंदिर मार्ग और तिलक मार्ग पुलिस थानों में ले जाया गया। सुबह जब यह खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैली कि इंसाफ मांग रहे पीड़ित माता-पिता को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है, तो नागरिक समाज और राजनीतिक गलियारों में जबर्दस्त आक्रोश फूट पड़ा। स्थिति की संवेदनशीलता और चौतरफा बढ़ते दबाव को देखते हुए आखिरकार दोपहर के वक्त पुलिस ने औपचारिक कागजी कार्रवाई पूरी कर माता-पिता और उनके समर्थकों को थाने से रिहा कर दिया।
पहाड़ों से दिल्ली तक क्यों आई आग: उस रहस्यमयी 'वीआईपी' का नाम अब तक क्यों है दफन?
यह सवाल हर भारतीय के जेहन में कौंध रहा है कि आखिर उत्तराखंड की अदालतों में चल रहे मुकदमे के बावजूद एक पीड़ित परिवार को दिल्ली की सड़कों पर रात बिताने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। इस आक्रोश की सबसे बड़ी वजह वह रहस्यमयी 'वीआईपी' है, जिसका जिक्र इस पूरे हत्याकांड की शुरुआत से ही एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। आरोप है कि ऋषिकेश के बहुचर्चित वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने वाली अंकिता पर रिसॉर्ट के मालिक और तत्कालीन सत्ताधारी दल के नेता के बेटे पुलकित आर्य द्वारा किसी 'खास वीआईपी गेस्ट' को 'एक्स्ट्रा सर्विस' (अवैध देह व्यापार) देने का दबाव बनाया जा रहा था। अंकिता ने अपने स्वाभिमान की खातिर इस अनैतिक मांग को ठुकरा दिया, जिसके बाद उसे नहर में धक्का देकर मौत के घाट उतार दिया गया। अंकिता के माता-पिता का सीधा और कड़वा आरोप है कि उत्तराखंड पुलिस की एसआईटी (SIT) ने पुलकित आर्य और उसके दो साथियों को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन जिस वीआईपी के लिए उनकी बेटी की जान ली गई, उस प्रभावशाली चेहरे को बचाने के लिए पूरी जांच को जानबूझकर भटकाया गया। घटना के तुरंत बाद सबूत मिटाने के मकसद से रिसॉर्ट के कमरों पर रातों-रात चलवाए गए बुलडोजर ने भी जांच एजेंसियों की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, जिसकी टीस आज भी परिवार के सीने में सुलग रही है।
कानून का हवाला बनाम आंसुओं का सैलाब: नई दिल्ली के पुलिस अधिकारियों ने दी सफाई
तड़के 4 बजे की गई हिरासत की कार्रवाई पर जब दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों से सवाल पूछे गए, तो उन्होंने इसे पूरी तरह से कानूनी और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत उठाया गया कदम बताया। पुलिस के अनुसार, नई दिल्ली जिला, विशेषकर इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन का इलाका अति-संवेदनशील सुरक्षा घेरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के तहत राष्ट्रीय राजधानी में किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन, धरने या सभा के लिए जंतर-मंतर या रामलीला मैदान का स्थान ही निर्धारित किया गया है। अधिकारियों का कहना था कि आधी रात को बिना किसी पूर्व प्रशासनिक अनुमति के इंडिया गेट पर धरना शुरू किया गया था, जो सुरक्षा नियमों का खुला उल्लंघन था। पुलिस ने सफाई दी कि माता-पिता के प्रति उनकी पूरी मानवीय संवेदनाएं हैं और उन्हें किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रतिबंधित क्षेत्र से हटाने के लिए एहतियातन हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) में लिया गया था। बाद में उन्हें सुरक्षित माहौल में समझाइश देकर और कानूनी औपचारिकताओं के बाद रिहा कर दिया गया। हालांकि, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जो परिवार अपनी मासूम बेटी खो चुका हो, उसके संवैधानिक अधिकारों और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति पर तड़के 4 बजे इस तरह पुलिसिया शक्ति का प्रदर्शन बेहद असंवेदनशील और लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग: जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन मोर्चे की तैयारी
थाने से रिहा होने के तुरंत बाद अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी ने मीडिया से बात करते हुए अपने इरादे साफ कर दिए। कांपती आवाज लेकिन फौलादी इरादों के साथ उन्होंने कहा कि वे अपनी बेटी के कातिलों को फांसी के फंदे तक पहुंचाए बिना और उस पर्दे के पीछे छिपे वीआईपी का चेहरा बेनकाब किए बिना चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च अदालत से हस्तक्षेप की मांग करते हुए दोहराया कि उत्तराखंड पुलिस और राज्य की एजेंसियों पर से उनका भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। परिवार की एकमात्र मांग है कि पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की सीधी निगरानी में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी जाए, ताकि सत्ता के रसूखदार चेहरों का सच देश के सामने आ सके। माता-पिता ने ऐलान किया है कि वे अब दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डालेंगे और जब तक केंद्र सरकार उनकी मांगों पर ठोस और लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक उनका यह सत्याग्रह अनवरत जारी रहेगा। दिल्ली में रहने वाले उत्तराखंडी समाज के संगठनों ने भी एकजुट होकर इस आंदोलन को बड़े जनआंदोलन में बदलने का आह्वान किया है।
न्याय व्यवस्था की चौखट पर ठिठकी उम्मीदें: क्या एक बेटी के बलिदान को मिलेगा मुकम्मल इंसाफ?
अंकिता भंडारी सिर्फ उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की बेटी नहीं थी, बल्कि वह भारत के उन करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों की उस उम्मीद का प्रतीक थी जो अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखते हैं। उस मासूम के साथ हुई दरिंदगी और उसके बाद सबूतों के साथ कथित छेड़छाड़ ने देश के आपराधिक न्याय तंत्र के सामने एक बड़ा आईना रख दिया है। आज जब उसके बूढ़े मां-बाप अपनी लाठी के सहारे देश की राजधानी की सड़कों पर ठोकरें खा रहे हैं, तो यह सवाल केवल एक मुकदमे का नहीं रह जाता, बल्कि उस भरोसे का बन जाता है जो आम जनता इस देश के कानून और संविधान पर रखती है। क्या निष्पक्ष जांच और कानून का शिकंजा उन सफेदपोशों तक भी पहुंचेगा जिनके हाथ पर्दे के पीछे से इस मामले को दबाने में लगे हैं? कोटद्वार की अदालत में चल रही गवाहियों और तारीखों के बीच, इंडिया गेट से जंतर-मंतर तक गूंजती अंकिता के माता-पिता की यह सिसकी तब तक व्यवस्था का पीछा करती रहेगी, जब तक कि उस चीला नहर के ठंडे पानी में डूबी सच्चाई पूरी तरह धूप की तरह साफ नहीं हो जाती।