विदेश

रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों को डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा तोहफा, भारत समेत 5 देशों को टैरिफ से पूरी छूट

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है, जिससे भारत समेत दुनिया के कई प्रमुख देशों ने राहत की सांस ली है। रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर दुनिया भर में तनाव का माहौल बना हुआ था, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और चीन समेत पांच ऐसे देशों को बहुत बड़ी राहत दी है जो रूस से भारी मात्रा में तेल और गैस का आयात करते हैं। इस नए फैसले के तहत रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर किसी भी तरह का भारी-भरकम टैरिफ या आर्थिक शुल्क नहीं लगाया जाएगा। आइए जानते हैं कि ट्रंप के इस अचानक आए फैसले के पीछे की क्या वजह है और इससे वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ेगा।

ग्राहम एक्ट के प्रतिबंधों से भारत और चीन को मिली बड़ी राहत

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कदम उठाते हुए भारत और चीन जैसे देशों को व्यापार शुल्कों (Trade Tariffs) और प्रतिबंधों से बड़ी राहत देने की आधिकारिक घोषणा की है। इस फैसले के बाद अब भारत और चीन द्वारा रूस से कच्चे तेल (Crude Oil) और गैस की खरीद पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त टैरिफ नहीं थोपा जाएगा।

बता दें कि पिछले महीने ही राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कड़े कानून पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि जो भी देश रूस से तेल या गैस का आयात करेगा, उसे कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी-भरकम शुल्कों का सामना करना पड़ेगा। इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना था, लेकिन इससे भारत और चीन जैसे उन देशों की मुश्किलें बढ़ जाती थीं जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं। अब इस नए कार्यकारी आदेश के जरिए ट्रंप ने इन देशों को फिलहाल इन सख्त प्रतिबंधों के दायरे से बाहर कर दिया है।

क्या है 'ग्राहम एक्ट' और इसके कड़े प्रावधान?

इस पूरे मामले के केंद्र में 'ग्राहम एक्ट' (Graham Act) है, जिसे दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम का समर्थन प्राप्त था। इस कड़े कानून के जरिए अमेरिका रूस पर पूर्ण आर्थिक शिकंजा कसना चाहता था। इस कानून में यह सख्त प्रावधान किया गया था कि यदि कोई भी देश रूस से बड़े पैमाने पर तेल या प्राकृतिक गैस खरीदता है, तो उसे गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।

यहाँ तक कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष देशों पर 100 प्रतिशत से लेकर 500 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। हालांकि, इस कानून में केवल उन्हीं देशों को छूट का प्रावधान था जो अपनी कुल घरेलू जरूरत का मात्र 15 प्रतिशत ही आयात करते हैं। लेकिन भारत और चीन जैसे देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदते हैं, इसलिए यह कानून उनके लिए चिंता का विषय बन गया था।

अमेरिका और रूस के बदलते समीकरण और राष्ट्रहित का हवाला

विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह ताजा फैसला ऐसे समय में आया है जब रूस और अमेरिका के बीच कूटनीतिक स्तर पर संबंधों में कुछ नरमी देखी जा रही है। हाल ही में यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की की कार्यशैली की आलोचना करने और रूस के साथ कूटनीतिक नजदीकी बढ़ाने के संकेतों के बीच ट्रंप का यह आदेश बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि, ट्रंप रूस और यूक्रेन दोनों के ही शीर्ष नेताओं से लगातार युद्ध रोकने की अपील करते रहे हैं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक युद्ध पूरी तरह थमा नहीं है।

शुक्रवार देर रात जारी किए गए एक कार्यकारी आदेश में व्हाइट हाउस की तरफ से यह स्पष्ट किया गया कि ग्राहम एक्ट के तहत आने वाले तमाम प्रतिबंधों और शुल्कों को फिलहाल लागू करने से छूट दी जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस को एक औपचारिक प्रमाण-पत्र सौंपा है, जिसमें उन्होंने इस कदम को पूरी तरह से 'राष्ट्रहित में उठाया गया कदम' बताया है।

किन पांच देशों को मिला है इस छूट का फायदा

रूस से तेल और गैस का आयात करने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों को इस नई राहत का सीधा फायदा मिला है। इन पांच देशों में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। चीन के बाद भारत वर्तमान में रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। भारत ने हमेशा अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को सर्वोपरि रखते हुए स्वतंत्र रूप से तेल आयात करने की नीति अपनाई है, और ट्रंप के इस फैसले से भारतीय रिफाइनरियों और अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली है।

हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि रूस से जुड़े टैरिफों और प्रतिबंधों पर यह रोक फिलहाल कुछ समय के लिए ही हो सकती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भविष्य में वैश्विक भू-राजनीति और अमेरिका के आर्थिक फायदों को ध्यान में रखते हुए इस नीति में बदलाव भी कर सकते हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में अमेरिका और रूस के संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और भारत की ऊर्जा कूटनीति इस पर क्या रुख अपनाती है।

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