उत्तर प्रदेश

लखनऊ में हाई-वोल्टेज ड्रामा,आईएएस ईशा प्रिया के खिलाफ सड़कों पर कर्मचारी, दफ्तर में जड़ दिया ताला

News India Live, Digital Desk : लखनऊ के गोमती नगर स्थित पर्यटन भवन (Tourism Bhawan) में जो हुआ, उसने सबको चौंका कर रख दिया है। अमूमन सरकारी दफ्तरों में फाइलें इधर-उधर होने की आवाजें आती हैं, लेकिन कल वहां तालों के लटकने और नारेबाजी की गूंज सुनाई दी। यूपी पर्यटन विभाग के कर्मचारियों ने अपनी ही बड़ी अधिकारी यानी प्रमुख सचिव (पर्यटन) ईशा प्रिया (Isha Priya) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।मामला इतना बढ़ गया कि नाराज कर्मचारियों ने दफ्तर के मेन गेट पर ताला जड़ दिया और जमकर हंगामा किया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि विभाग के लोग अपनी ही बॉस के खिलाफ हो गए?”गाली देती हैं और निजी काम कराती हैं”कर्मचारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है और उनकी शिकायतें बेहद गंभीर हैं। उनका आरोप है कि ईशा प्रिया का व्यवहार अपने अधीनस्थ कर्मचारियों (खासकर ड्राइवरों और छोटे स्टाफ) के प्रति बेहद खराब है।प्रदर्शन कर रहे लोगों ने दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलकर कहा कि मैडम न सिर्फ़ “तू-तड़ाक” और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करती हैं, बल्कि मानसिक रूप से प्रताड़ित (Torture) भी करती हैं।ड्राइवर का दर्द: ‘खाना भी नसीब नहीं होता’सबसे ज्यादा दर्द ड्राइवरों ने बयां किया। उनका कहना है कि उनसे सरकारी काम के अलावा निजी काम भी करवाए जाते हैं। आरोप यहाँ तक लगे हैं कि उनसे घर के काम करवाए जाते हैं और ड्यूटी के घंटे इतने लंबे खींच दिए जाते हैं कि उन्हें लंच या डिनर तक का वक्त नहीं मिलता। कर्मचारियों का कहना है, “भैया, हम सरकार की नौकरी करते हैं, किसी की पर्सनल गुलामी नहीं। हमारी भी कोई इज्जत है।”सब्र का बांध टूटा तो…काफी समय से अंदर ही अंदर सुलग रही यह आग अब ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी है। पर्यटन निदेशालय के कर्मचारी संघ ने साफ कर दिया है कि अब यह व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कर्मचारियों ने एकजुट होकर ऐलान कर दिया है कि जब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होता और उन्हें सम्मान नहीं मिलता, वो पीछे नहीं हटेंगे।यह घटना यह भी दिखाती है कि कैसे कभी-कभी ‘अफसरशाही’ (Bureaucracy) का रौब कर्मचारियों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाता है। फिलहाल, शासन तक बात पहुँच चुकी है, लेकिन कर्मचारियों का गुस्सा अभी ठंडा होता नहीं दिख रहा। देखना यह है कि क्या इस पर कोई कार्रवाई होती है या फिर हर बार की तरह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

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