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वकील बनने आए थे, बन गए बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार अशोक कुमार की वो कहानी जो बहुत कम लोग जानते हैं

News India Live, Digital Desk : आज (10 दिसंबर) की तारीख भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक भारी मन वाली तारीख है। आज से ठीक 24 साल पहले, हमने एक ऐसे कलाकार को खो दिया था जिसे पूरी इंडस्ट्री प्यार से “दादामुनि” (बड़े भाई) बुलाती थी। जी हाँ, हम बात कर रहे हैंअशोक कुमार (Ashok Kumar) की।आज शाहरुख-सलमान के स्टारडम की बातें होती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत का”पहला सुपरस्टार” असल में अशोक कुमार ही थे? उनकी फिल्म ‘किस्मत’ (1943) ने उस जमाने में लगातार 3 साल तक थियेटर में चलने का रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन क्या आपको पता है कि यह महान एक्टर कभी एक्टिंग करना ही नहीं चाहता था?आइए, दादामुनि की पुण्यतिथि पर आपको उनकी ज़िंदगी का एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं।वकालत का काला कोट पहनना था, पर…अशोक कुमार का असली नामकुमुदलाल गांगुली था। उनका जन्म भागलपुर में हुआ था और उनका सपना फिल्मों में हीरो बनना तो दूर, कैमरे के सामने आने का भी नहीं था। उनका सपना था एक सफलवकील बनना। कानून की पढ़ाई करने के बाद वे कोलकाता (तब कलकत्ता) में वकालत की प्रैक्टिस भी करने वाले थे।लेकिन कहते हैं न, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उनका मन वकालत में नहीं लगा और वे मुंबई आ गए। यहाँ उनका इरादा ‘बॉम्बे टॉकीज’ में डायरेक्टर या तकनीशियन बनने का था। वे पर्दे के पीछे रहकर काम करना चाहते थे, पर्दे पर नहीं।फिर कैसे बने एक्टर?यह किस्सा बड़ा मजेदार है। उस वक्त बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जीवन नैया’ बन रही थी। किसी वजह से फिल्म के लीड हीरो को निकाल दिया गया। फिल्म के प्रोड्यूसर हिमांशु राय बहुत परेशान थे। उनकी नज़र अचानक लैब में काम कर रहे अशोक कुमार पर पड़ी। उन्होंने तुरंत फैसला लिया कि “यह लड़का ही हमारा अगला हीरो होगा।”अशोक कुमार ने बहुत मना किया, यह तक कहा कि मुझे एक्टिंग का ‘ए’ भी नहीं आता। लेकिन हिमांशु राय ने उन्हें जबरदस्ती मेकअप रूम में भेज दिया। और बस, वहीं से भारतीय सिनेमा को अपना सबसे नायाब हीरा मिल गया।चिल्लाना नहीं, बस आँखों से बात करना सिखायाअशोक कुमार से पहले नाटकों (Theatre) वाली एक्टिंग चलती थी ज़ोर-ज़ोर से डायलॉग बोलना और हाथ नचाना। अशोक कुमार ने इसे पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने”नेचुरल एक्टिंग” (Natural Acting) की शुरुआत की। वे डायलॉग बोलते नहीं थे, बल्कि ऐसे बात करते थे जैसे हम और आप आम ज़िंदगी में करते हैं।उनका सिगरेट पीने का अंदाज़, उनकी मुस्कुराहट और डायलॉग डिलीवरी सब कुछ इतना सहज था कि लोग उनके दीवाने हो गए। बाद में जब हम सब टीवी के दौर में आए, तो”हम लोग” सीरियल में उनका आना और नरेटर बनकर कहानी सुनाना हर घर की पसंद बन गया।एक युग का अंत10 दिसंबर 2001 को 90 साल की उम्र में अशोक कुमार ने अपनी अंतिम सांस ली। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फ़िल्में जैसे ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘महल’, और ‘किस्मत’ हमेशा याद दिलाती रहेंगी कि स्टारडम शोर मचाने से नहीं, बल्कि दिल जीतने से मिलता है।

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