वीडियो कॉल पर ‘अंतिम विदाई’ और वीरान श्मशान: पिता की मृत्यु पर भी दूरियों की मजबूरी… क्या आधुनिकता ने निगल ली हमारी मानवीय संवेदनाएं?

आधुनिकता के इस चमचमाते दौर में इंसानी सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक समृद्धि के मोर्चे पर अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छुआ है। हम चंद्रमा पर कॉलोनियां बसाने की बात कर रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जरिए दुनिया को मुट्ठी में बंद करने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इस तथाकथित प्रगति के समानांतर एक बेहद खौफनाक और संवेदनहीन यथार्थ हमारी चौखट पर आकर खड़ा हो गया है। एक पिता जिसने अपनी पूरी जिंदगी, अपनी खुशियां, अपनी संचित पूंजी और अपनी जवानी बेटे को 'बड़ा' बनाने में न्योछावर कर दी, जब उसकी अंतिम सांसें टूटती हैं, तो श्मशान घाट वीरान पड़ा होता है। मुखाग्नि देने वाला बेटा हजारों मील दूर एक ठंडे कमरे में बैठकर 'स्मार्टफोन' की हाई-डेफिनिशन स्क्रीन पर पिता की जलती चिता को लाइव देख रहा होता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति के शरीर का दाह-संस्कार नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण भारतीय सामाजिक व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं का अंतिम संस्कार है जो कभी रिश्तों के जुड़ाव पर टिकी हुआ करती थी।
तकनीक की नजदीकियां और दिलों की बढ़ती मीलों लंबी दूरियां
तकनीक का सबसे बड़ा वादा यह था कि वह दुनिया को करीब लाएगी और दूरियों को मिटा देगी। वीडियो कॉल, हाई-स्पीड इंटरनेट और 5G नेटवर्क ने भूगोल की सीमाओं को तो धुंधला कर दिया, लेकिन इसने दिलों के बीच प्रकाश वर्ष की दूरी पैदा कर दी है। आज दूर बैठा व्यक्ति स्क्रीन पर रोता हुआ चेहरा तो देख सकता है, लेकिन वह अपने पिता के ठंडे पड़ चुके माथे को छूकर अंतिम स्पर्श का अहसास नहीं कर सकता। डिजिटल माध्यमों ने हमारी संवेदनाओं को भी 'वर्चुअल' बना दिया है। आंसू अब पिक्सेल में तब्दील हो चुके हैं और शोक संवेदनाएं व्हाट्सएप संदेशों के इमोटिकॉन्स तक सिमट गई हैं। जब तक इंसान किसी के दुख में शारीरिक रूप से उपस्थित होकर उसके कंधे पर हाथ न रखे, तब तक वह दुख साझा नहीं होता; वह केवल एक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। हम इस मुगालते में जी रहे हैं कि हम तकनीक से जुड़े हैं, जबकि वास्तव में हम आत्महीनता के एक बेहद खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुके हैं।
करियर की अंधी दौड़ में पीछे छूटते बुजुर्ग और खोते पारिवारिक संस्कार
इस त्रासदी की जड़ें हमारी नई जीवनशैली, वैश्विक महात्वाकांक्षाओं और तथाकथित 'सक्सेस' की परिभाषा में छिपी हैं। बेहतर भविष्य, डॉलर-पाउंड की कमाई और कॉरपोरेट सीढ़ियां चढ़ने की होड़ में आज की युवा पीढ़ी अपने घर-आंगन को पीछे छोड़ चुकी है। माता-पिता भी खुशी-खुशी अपने कलेजे के टुकड़े को विदेश या बड़े शहरों में भेजते हैं, यह सोचकर कि उनके बच्चे का जीवन संवर रहा है। लेकिन जब उम्र के ढलान पर उन बुजुर्गों को सबसे ज्यादा अपनों के सहारे, एक कप चाय के साथ दो बातों और अपनी बीमारी में दवा देने वाले हाथों की जरूरत होती है, तो वे चार दीवारों के सन्नाटे में घुटते रहते हैं। जब अचानक मौत की खबर आती है, तो फ्लाइट की टिकट न मिलने, वीजा की बंदिशों या 'इम्पॉर्टेंट बिजनेस मीटिंग' का बहाना बनाकर वीडियो कॉल ऑन कर ली जाती है। यह सवाल हर संवेदनशील मन को झकझोरता है कि जिस करियर और पैसे के लिए इंसान अपने जन्मदाता के अंतिम दर्शन का समय नहीं निकाल पाता, उस सफलता का अंततः मूल्य क्या है?
'आउटसोर्स' होता अंतिम संस्कार और किराए की संवेदनाएं
अब वह दौर आ चुका है जहां अंतिम संस्कार जैसी पवित्र और व्यक्तिगत प्रक्रिया भी व्यावसायिक सेवा (Business Service) बन चुकी है। मेट्रो शहरों में ऐसे स्टार्टअप्स और एजेंसियां फल-फूल रही हैं जो आपके परिजनों की मृत्यु पर अंतिम संस्कार का पूरा 'पैकेज' उपलब्ध कराती हैं। पंडित, अर्थी, राम नाम सत्य कहने वाले चार लोग, कफन से लेकर श्मशान घाट की बुकिंग तक—सब कुछ आउटसोर्स किया जा रहा है। अगर बेटा विदेश में है, तो ये एजेंसियां वीडियोग्राफर भेजकर चिता को लाइव स्ट्रीम कर देती हैं और भाड़े के लोग मुखाग्नि की रस्म निभा देते हैं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह को कंपाने के लिए काफी है। जिस समाज में दाह-संस्कार को केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि भावात्मक ऋण चुकाने का अंतिम क्षण माना जाता था, वहां अब पैसों के दम पर संवेदनाएं खरीदी और बेची जा रही हैं।
एकल परिवार और 'व्यक्तिवाद' का बढ़ता शिकंजा
संयुक्त परिवारों के टूटने और 'न्यूक्लियर फैमिली' (एकल परिवार) की संस्कृति ने इस सामाजिक बिखराव को और ज्यादा हवा दी है। पहले परिवार में चाचा, ताऊ, भाई-भतीजे और पूरा मोहल्ला दुख की इस घड़ी में ढाल बनकर खड़ा हो जाता था। लेकिन अत्यधिक 'व्यक्तिवाद' (Individualism) के इस दौर में अब हर व्यक्ति अपनी ही बनाई निजी जीवन-शैली के खोल में बंद है। पड़ोसियों को भी एक-दूसरे की सुध नहीं होती। समाज में सामाजिक दायित्व का बोध लगातार खत्म हो रहा है। हम इतने आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं कि किसी दूसरे के दुख में शामिल होना हमें अपने समय और निजता (Privacy) का नुकसान लगने लगा है। नतीजा यह है कि घर के बुजुर्ग अनाथों की तरह जीवन जीने और उसी तरह दम तोड़ने के लिए मजबूर हैं।
क्या यही है हमारी नई सामाजिक नियति और भावी पीढ़ियों का भविष्य?
पिता की मौत पर वीडियो कॉल का यह 'नया दौर' केवल आज का सच नहीं है, यह कल का एक खौफनाक चेतावनी पत्र भी है। आज जो युवा अपने माता-पिता के साथ यह व्यवहार कर रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि उनकी संतानें भी इसी संस्कृति और वातावरण में सांस ले रही हैं। जो बोया जा रहा है, वही काटा जाएगा। आने वाले समय में जब आज की युवा पीढ़ी बुजुर्ग होगी, तो शायद उनके लिए तकनीक और भी अधिक उन्नत हो चुकी होगी—हो सकता है तब वीडियो कॉल की जगह कोई 'होलोग्राम' या एआई अवतार श्मशान में खड़ा हो। लेकिन क्या उस समय उस कृत्रिम तकनीक के भीतर कोई इंसानी दिल धड़क रहा होगा? यह विचार ही रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
प्रगति, विदेश यात्राएं और आर्थिक समृद्धि बुरी बात नहीं हैं। जीवन में आगे बढ़ना हर इंसान का अधिकार है। लेकिन विकास की यह कीमत यदि हमारे मानवीय मूल्यों, माता-पिता के प्रति कर्तव्यों और आत्मिक संवेदनाओं की बलि देकर चुकाई जा रही है, तो हमें रुककर सोचना होगा। वक्त आ गया है कि हम अपनी प्राथमिकताओं का पुनः मूल्यांकन करें। स्क्रीन के उस पार से मिलने वाली सांत्वना कभी उस जीवित स्पर्श की जगह नहीं ले सकती, जो एक बेटा या बेटी अपने माता-पिता को उनकी आखिरी सांसों के समय दे सकते हैं। यदि हमने अब भी अपनों की शारीरिक मौजूदगी, समय और भावनात्मक जुड़ाव को तवज्जो देना शुरू नहीं किया, तो यह नया दौर हमें एक ऐसे बंजर समाज में तब्दील कर देगा जहाँ इंसान तो होंगे, लेकिन इंसानियत और रिश्ते पूरी तरह विलुप्त हो चुके होंगे।