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संकरी गलियों में जिंदगी बचाने वाली ‘बाइक एम्बुलेंस’ पर केंद्र का बड़ा चाबुक: अब हर 2 साल में फिटनेस टेस्ट अनिवार्य

महानगरों के भीषण ट्रैफिक जाम और पुराने ऐतिहासिक शहरों की बेहद तंग गलियों में जब जिंदगी और मौत के बीच महज चंद मिनटों का फासला रह जाता है, तब सायरन बजाती चार पहिया एम्बुलेंस अक्सर बेबस होकर जाम में फंसी नजर आती है। ऐसे गंभीर आपातकालीन पलों में 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' के तौर पर काम आने वाली टू-व्हीलर (मोटरसाइकिल या स्कूटर) एम्बुलेंस लाखों लोगों के लिए जीवनदायिनी साबित होती रही है। हालांकि, अब तक देश में इन दोपहिया एम्बुलेंसों के निर्माण, तकनीकी बनावट और सुरक्षा पैमानों को लेकर कोई एक समान राष्ट्रीय कानूनी ढांचा मौजूद नहीं था। इसी गंभीर विसंगति को दूर करते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने केंद्रीय मोटर यान नियमावली (CMVR), 1989 में ऐतिहासिक संशोधन का ड्राफ्ट जारी कर नए और बेहद सख्त नियम लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठा दिया है। सरकार के नए दिशा-निर्देशों के तहत अब सभी टू-व्हीलर रोड एम्बुलेंस को आधिकारिक रूप से 'परिवहन वाहन' (Transport Vehicle) की श्रेणी में पंजीकृत किया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव वाहन की फिटनेस को लेकर किया गया है—अब हर दोपहिया एम्बुलेंस के लिए फिटनेस प्रमाण पत्र (Fitness Certificate) का हर दो साल में अनिवार्य नवीनीकरण (रिन्यूअल) कराना कानूनी रूप से जरूरी कर दिया गया है। इसका सीधा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी गंभीर मरीज की जान बचाने के लिए दौड़ने वाली बाइक खुद किसी तकनीकी खराबी, ब्रेक फेलियर या टायर फटने के खतरे से ग्रस्त न हो।

क्या है AIS-209 मानक: सायरन, टॉप-लाइट्स और स्ट्रेचर माउंटिंग के लिए तय हुए सख्त नियम

सड़क परिवहन मंत्रालय ने इन वाहनों की तकनीकी गुणवत्ता और संरचना को वैश्विक स्तर पर सुरक्षित बनाने के लिए ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड यानी 'AIS-209 (Part 1): 2026' को अनिवार्य रूप से अपनाने का आदेश दिया है। इस नए तकनीकी फ्रेमवर्क के तहत एल-2 (L2) श्रेणी की दोपहिया रोड एम्बुलेंस के निर्माण और उनकी कार्यात्मक क्षमताओं के लिए कड़े मापदंड तय किए गए हैं। मंत्रालय के ड्राफ्ट के अनुसार, 1 अक्टूबर 2026 से ही सभी दोपहिया एम्बुलेंसों पर लगने वाली शीर्ष चेतावनी बत्ती (Top-Mounted Emergency Warning Flashing Lights) को AIS-209 मानकों के अनुरूप होना आवश्यक होगा। वहीं, 1 अक्टूबर 2027 के बाद निर्मित होने वाली सभी नई एल-2 श्रेणी की दोपहिया एम्बुलेंसों को पूरी तरह से AIS-209 के हर सुरक्षा मानक का शत-प्रतिशत पालन करना होगा। इसके तहत केवल किसी सामान्य बाइक पर लाल-नीली बत्ती या सायरन टांग देने भर से उसे एम्बुलेंस का दर्जा नहीं मिलेगा। नए मानकों में स्पष्ट किया गया है कि वाहन के साथ अटैच की जाने वाली एम्बुलेंस एक्सेसरी यूनिट या मरीज को ले जाने वाली पेशेंट कन्वेयंस यूनिट (जैसे साइडकार या स्ट्रेचर मॉड्यूल) मुख्य मोटरसाइकिल की बॉडी के साथ मजबूती और तकनीकी रूप से सुरक्षित तरीके से लॉक होनी चाहिए, ताकि तेज मोड़ या उबड़-खाबड़ रास्तों पर वाहन का संतुलन कभी न बिगड़े।

'गोल्डन ऑवर' में वरदान साबित होगी टू-व्हीलर एम्बुलेंस: लखनऊ से लेकर पहाड़ी रास्तों तक ट्रैफिक जाम की काट

चिकित्सा विज्ञान में किसी सड़क हादसे या हार्ट अटैक के बाद के शुरुआती 60 मिनट को 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है, जिसमें मरीज को मिलने वाला तुरंत प्राथमिक उपचार उसकी जान बचने की संभावना को 80 फीसदी तक बढ़ा देता है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चौक, यहियागंज, अमीनाबाद, हजरतगंज के पुराने बाजार हों या पुरानी दिल्ली, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर और हैदराबाद की ऐतिहासिक संकरी गलियां—इन इलाकों में बड़ी वैन या टेम्पो ट्रैवलर एम्बुलेंस का समय पर पहुंचना लगभग नामुमकिन होता है। यही स्थिति उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी रास्तों की भी है, जहां संकरे मोड़ों पर भारी वाहन फंस जाते हैं। ऐसे संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों में प्रशिक्षित पैरामेडिक्स के साथ दौड़ने वाली आधुनिक दोपहिया एम्बुलेंस ट्रैफिक को चीरते हुए मौके पर सबसे पहले पहुंचती है। नए नियमों का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इन बाइकों में सिर्फ प्राथमिक पट्टी ही नहीं, बल्कि पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED), इमरजेंसी इंजेक्शन, सक्शन मशीन, बीपी मॉनिटर और अत्याधुनिक जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण मानक के अनुसार सुरक्षित रखे जा सकेंगे। इससे मुख्य एडवांस लाइफ सपोर्ट (ALS) एम्बुलेंस के पहुंचने से पहले ही मरीज की हालत को स्थिर (स्टेबलाइज) किया जा सकेगा।

अग्निशामक यंत्र, टायर सेफ्टी और लोडिंग तंत्र: फिटनेस जांच में क्या-क्या परखेगा आरटीओ?

हर दो साल में होने वाली अनिवार्य फिटनेस जांच के लिए परिवहन विभाग के आरटीओ (RTO) और ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशनों को बेहद विस्तृत और सख्त चेकलिस्ट सौंपी जा रही है। फिटनेस टेस्ट के दौरान केवल इंजन की जांच नहीं होगी, बल्कि मुख्य मोटरसाइकिल और साइड-माउंटेड एम्बुलेंस यूनिट के टायरों, पहियों, रिम्स और अलॉय की बारीक पड़ताल की जाएगी। यह देखा जाएगा कि टायरों में कोई गहरा कट, उभार या अत्यधिक घिसाव तो नहीं है, जो तेज रफ्तार में वाहन के असंतुलन का कारण बन सके। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण मरीज को चढ़ाने और उतारने वाले 'लोडिंग और अनलोडिंग मैकेनिज्म' का होगा। स्ट्रेचर की स्लाइडिंग प्रणाली सुचारू होनी चाहिए और मरीज को लोड करते समय किसी अत्यधिक बल या झटके की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक टू-व्हीलर एम्बुलेंस में प्रमाणित और वैध एक्सपायरी वाला उपयुक्त अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher) लगाना अनिवार्य होगा, जो चालक और पैरामेडिक की आसान पहुंच में हो ताकि शॉर्ट सर्किट या आग लगने की आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। यदि इनमें से एक भी पैरामीटर पर खराबी पाई गई, तो फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाएगा और वाहन को सड़क पर उतारने पर भारी जुर्माने के साथ जब्ती की कार्रवाई होगी।

राज्यों को मिली ऑपरेशनल एरिया तय करने की ताकत: प्राइवेट ऑपरेटरों और हेल्थकेयर सेक्टर पर क्या होगा असर?

केंद्र सरकार के इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन की एक और सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें सहकारी संघवाद और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों का पूरा ख्याल रखा गया है। नए नियमों में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि दोपहिया रोड एम्बुलेंस केवल संबंधित राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित और निर्धारित क्षेत्रों में ही संचालित होने के लिए पंजीकृत की जाएंगी। इसका मतलब यह है कि राज्य सरकारें अपने स्थानीय ट्रैफिक लोड, गलियों की चौड़ाई, ग्रामीण व पर्वतीय जरूरतों और दुर्घटना संभावित ब्लैक-स्पॉट्स के आधार पर यह तय करेंगी कि किन शहरों, जिलों या विशेष वार्डों में इन टू-व्हीलर एम्बुलेंसों को परमिट दिया जाए। निजी अस्पतालों, कॉर्पोरेट हेल्थकेयर कंपनियों, एनजीओ और सरकारी आपातकालीन सेवा प्रदाताओं (जैसे 108 सेवा) के लिए यह एक स्पष्ट नियामक मार्गदर्शिका लेकर आया है। अब तक जो ऑपरेटर स्थानीय मैकेनिकों से जुगाड़ करके बाइक में सायरन और डिब्बा जोड़ लेते थे, उन्हें अब मान्यता प्राप्त ऑटोमोबाइल बॉडी बिल्डर्स से ही प्रमाणित बॉडी लगवानी होगी। हालांकि इससे शुरुआती पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह हेल्थकेयर फ्लीट के मेंटेनेंस खर्च को घटाएगा और सेवा की विश्वसनीयता को कई गुना मजबूत करेगा।

अवैध मॉडिफिकेशन और फर्जीवाड़े पर लगेगी लगाम: जानिए मरीज और तीमारदारों को कैसे मिलेगा सीधा फायदा?

सड़कों पर कई बार देखा जाता है कि अनधिकृत लोग अपनी निजी बाइकों पर लाल-नीली बत्तियां और गैर-कानूनी हूटर लगाकर ट्रैफिक पुलिस से बचने या अवैध वसूली के लिए एम्बुलेंस का दिखावा करते हैं। केंद्र सरकार द्वारा टू-व्हीलर एम्बुलेंस को विशेष ट्रांसपोर्ट वाहन का दर्जा देने और दो साल के कड़े फिटनेस चक्र में बांधने से इस फर्जीवाड़े पर पूरी तरह ताला लग जाएगा। आम जनता और जरूरतमंद मरीजों के नजरिए से देखें तो यह फैसला उनकी सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा। जब किसी गंभीर मरीज को बाइक एम्बुलेंस पर प्राथमिक उपचार दिया जा रहा होगा, तो परिजनों को यह पूरा भरोसा रहेगा कि जिस वाहन पर उनका परिजन सवार है, वह सरकार द्वारा प्रमाणित, तकनीकी रूप से सुरक्षित और जीवनरक्षक दवाओं से पूरी तरह लैस है। परिवहन विशेषज्ञों और स्वास्थ्य नीति विश्लेषकों का मानना है कि यह नीतिगत सुधार भारत के आपातकालीन ट्रॉमा केयर इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी छलांग है, जो भविष्य में हजारों असमय मौतों को टालने में सबसे अहम भूमिका निभाएगा।

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