विदेश

सऊदी अरब के परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर CIA की सीक्रेट रिपोर्ट से मचा हड़कंप

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मध्य पूर्व के कूटनीतिक गलियारों में उस वक्त भूचाल आ गया जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की एक अत्यंत गोपनीय और संवेदनशील रिपोर्ट कैपिटल हिल यानी अमेरिकी संसद को सौंपी गई। इस सीक्रेट रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि सऊदी अरब अपने शांतिपूर्ण नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की आड़ में भविष्य के लिए परमाणु हथियार विकसित करने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और रियाद के बीच हाल ही में संपन्न हुए एक उच्चस्तरीय सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट यानी परमाणु सहयोग समझौते के बाद सामने आए इस खुफिया आकलन ने वाशिंगटन की राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। इस खुलासे के सामने आने के बाद अमेरिकी सांसदों और नीति निर्माताओं के बीच तीखी बहस छिड़ गई है, जिससे राष्ट्रपति ट्रंप का यह महत्वाकांक्षी कूटनीतिक और व्यापारिक सौदा गंभीर संकट में पड़ गया है और संसद में इसे औपचारिक रूप से रद्द किए जाने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।

सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया दस्तावेजों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी अधिकारियों के बीच हुए इस द्विपक्षीय नागरिक परमाणु समझौते के तहत अमेरिका द्वारा रियाद को परमाणु तकनीक, संवेदनशील उपकरण और ईंधन आपूर्ति की रूपरेखा तैयार की गई है। हालांकि, इस डील के कानूनी दस्तावेजों के साथ जो गोपनीय खुफिया आकलन अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को समीक्षा के लिए भेजा गया, उसमें साफ तौर पर चेतावनी दी गई है कि सऊदी अरब इस उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करके अपने देश में यूरेनियम संवर्धन यानी यूरेनियम एनरिचमेंट की क्षमता हासिल कर सकता है। सीआईए की इस रिपोर्ट में इस बात की आशंका जताई गई है कि एक बार यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हासिल हो जाने के बाद रियाद के लिए परमाणु हथियार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाना तकनीकी रूप से आसान हो जाएगा। अमेरिकी खुफिया एजेंसी का यह आकलन ऐसे समय में सामने आया है जब देश के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली डेमोक्रेट सांसदों ने इस समझौते को वैश्विक अप्रसार मानकों के खिलाफ और मध्य पूर्व की शांति के लिए बेहद खतरनाक करार दिया है। सांसदों का यह स्पष्ट तर्क है कि इस तरह के समझौतों से पूरे क्षेत्र में एक नया और विनाशकारी परमाणु हथियारों का मुकाबला शुरू हो सकता है, जिससे वैश्विक स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

अमेरिकी संसद में बढ़ती सुगबुगाहट और डेमोक्रेटिक सांसदों का कड़ा रुख

सीआईए की इस सीक्रेट रिपोर्ट के सार्वजनिक होने और कैपिटल हिल तक पहुंचने के बाद अमेरिकी संसद में भारी राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। सीनेटर एड मार्के और जेफ मर्कले समेत कई प्रमुख अमेरिकी सांसदों ने विदेश विभाग और संबंधित समितियों को एक सख्त पत्र लिखकर अपनी गहरी चिंता जाहिर की है। इन सांसदों का यह आरोप है कि ट्रंप प्रशासन ने पारंपरिक सुरक्षा मानकों को दरकिनार करते हुए और सऊदी अरब के कूटनीतिक दबाव के आगे झुकते हुए बहुत ही ढीले प्रावधानों वाला समझौता तैयार किया है, जिससे रियाद के लिए गुप्त परमाणु हथियारों के रास्ते खुल सकते हैं। अमेरिकी कानून के मुताबिक इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय समझौतों को एक निश्चित संसदीय समीक्षा अवधि से गुजरना पड़ता है, और जानकारों का मानना है कि इस 90-दिवसीय समीक्षा के दौरान विपक्षी सांसद इस परमाणु समझौते को रोकने के लिए एक संयुक्त प्रस्ताव लाने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। यदि यह प्रस्ताव संसद में पारित हो जाता है, तो ट्रंप प्रशासन के लिए इस डील को आगे बढ़ाना कानूनी और राजनीतिक रूप से बेहद मुश्किल हो जाएगा।

सऊदी अरब का रुख और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर संभावित प्रभाव

दूसरी तरफ, इन तमाम गंभीर विवादों और अमेरिकी मीडिया में चल रही आलोचनाओं के बीच सऊदी अरब ने अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से शांतिपूर्ण, पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में बताया है। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय और अन्य उच्चस्तरीय अधिकारियों का यह आधिकारिक बयान आया है कि देश का नागरिक परमाणु कार्यक्रम केवल भविष्य की घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने, बिजली उत्पादन बढ़ाने और देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर विविधता देने के लिए है। रियाद का हमेशा से यही दावा रहा है कि वह परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने वाली अंतरराष्ट्रीय संधियों का सम्मान करता है। इसके साथ ही, अमेरिकी विदेश विभाग ने भी इस समझौते का बचाव करते हुए बयान जारी किया है कि वाशिंगटन किसी भी रूप में सऊदी अरब के परमाणु हथियार कार्यक्रम का समर्थन नहीं करता है और समझौते में कड़े सुरक्षा प्रावधान रखे गए हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के कई पूर्व निरीक्षकों और वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि बिना सख्त और अतिरिक्त निरीक्षण प्रोटोकॉल के इस तरह के समझौतों पर आगे बढ़ना मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है, जिससे आने वाले समय में कूटनीतिक तनाव और अधिक बढ़ सकते हैं।

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