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सरकारी स्कूलों से अचानक गायब हुए 2.26 करोड़ बच्चे, क्या वे प्राइवेट स्कूल गए या छूट गई पढ़ाई? जानिए स्कूल मर्जर का कड़वा सच

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐसा चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है, जिसने अभिभावकों और शिक्षाविदों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश भर के सरकारी स्कूलों से लगभग 2.26 करोड़ बच्चों ने किनारा कर लिया है। यह कोई छोटी संख्या नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने सारे बच्चे अचानक गए कहां? क्या उन्होंने बेहतर शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का रुख किया है, या फिर उनकी पढ़ाई ही बीच में छूट गई है? इसके पीछे सरकार की 'स्कूल मर्जर' नीति को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। आइए इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत को समझते हैं।

कहां गए 2.26 करोड़ बच्चे?

जब इतनी बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों से नाम कटते हैं, तो इसके दो ही मुख्य पहलू सामने आते हैं। पहला यह कि महामारी के बाद हालात सामान्य होने पर कई माता-पिता ने अपने बच्चों को वापस प्राइवेट स्कूलों में भेजना शुरू कर दिया है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कम फीस वाले छोटे प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा और सबसे डरावना पहलू यह है कि इनमें से एक बड़ी आबादी उन बच्चों की भी है, जिनकी पढ़ाई पूरी तरह से छूट गई है। आर्थिक तंगी, रोजी-रोटी का संकट और स्कूल का घर से दूर होना ऐसे मुख्य कारण हैं, जिनकी वजह से गरीब परिवारों के बच्चे, खासकर लड़कियां, शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो गए हैं।

स्कूल मर्जर की असली कहानी

सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या को देखते हुए कई राज्यों ने 'स्कूल मर्जर' (विद्यालयों का विलय) की नीति अपनाई है। इस नीति के तहत, जिन स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम है, उन्हें बंद करके वहां के बच्चों को पास के किसी बड़े सरकारी स्कूल में शिफ्ट किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा और बच्चों को अच्छी सुविधाएं मिलेंगी।

लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी कहानी कुछ और ही है। स्कूल मर्जर की वजह से कई बच्चों के लिए स्कूल की दूरी बढ़ गई है। छोटे बच्चों और लड़कियों के लिए हर दिन कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना सुरक्षित और व्यावहारिक नहीं है। नतीजतन, ट्रांसपोर्ट की सुविधा न होने और सुरक्षा चिंताओं के कारण कई माता-पिता ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।

आगे का रास्ता क्या है?

यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सिर्फ नीतियां बना देना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके जमीनी असर का आकलन करना भी बेहद जरूरी है। अगर सरकार चाहती है कि हर बच्चे को शिक्षा मिले, तो स्कूल मर्जर करते समय बच्चों के घर से स्कूल की दूरी और उनके लिए सुरक्षित परिवहन का ध्यान रखना होगा। इसके साथ ही सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को इतना मजबूत करना होगा कि अभिभावक खुद अपने बच्चों को वहां भेजना चाहें, न कि मजबूरी में प्राइवेट स्कूलों की महंगी फीस चुकाएं।

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