सावन का पहला सोमवार 2 अगस्त को: पीरियड्स के दौरान रखें या छोड़ें सावन और सोलह सोमवार का व्रत

देवों के देव महादेव को समर्पित पवित्र सावन का महीना शुरू हो चुका है और इस बार सावन का पहला सोमवार 2 अगस्त को पड़ रहा है। शिवभक्तों ने भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। कुंवारी कन्याएं और सुहागन महिलाएं विशेष रूप से सावन सोमवार और सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं, ताकि उन्हें मनचाहा वर या अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिल सके। हालांकि, महिलाओं और युवतियों के सामने अक्सर एक बड़ी दुविधा यह आती है कि अगर व्रत के दौरान महावारी (पीरियड्स) आ जाए, तो उन्हें व्रत रखना चाहिए या नहीं और पूजा के नियम क्या कहते हैं। आइए जानते हैं धर्मशास्त्र और ज्योतिषीय ग्रंथों के अनुसार इसका सही और सटीक विधान।
क्या पीरियड्स के दौरान रखा जा सकता है सावन सोमवार का व्रत?
सनातन धर्म और ज्योतिषीय जानकारों के अनुसार, यदि किसी महिला या युवती ने सावन सोमवार या सोलह सोमवार का संकल्प लिया है, तो पीरियड्स (रजोनिवृत्ति/मासिक धर्म) शुरू होने पर भी व्रत को बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। व्रत का अर्थ सिर्फ शारीरिक रूप से पूजा करना ही नहीं, बल्कि मन और तन से उपवास रखना भी है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक, शारीरिक अशुद्धि के दिनों में भी व्रत का नियम जारी रखा जा सकता है, क्योंकि उपवास का संकल्प मन से जुड़ा होता है। इसलिए महिलाओं को बिना किसी संकोच के अपना व्रत जारी रखना चाहिए और खान-पान के नियमों का पालन करना चाहिए।
मासिक धर्म के दौरान पूजा और स्पर्श से जुड़े खास नियम
व्रत भले ही रखा जाए, लेकिन पूजा-पाठ और भगवान शिव की आराधना के तौर-तरीकों में कुछ पाबंदियों का पालन करना जरूरी होता है। पीरियड्स के दिनों में महिलाओं को मंदिर के गर्भ गृह में जाने, शिवलिंग का स्पर्श करने, जल चढ़ाने या बेलपत्र अर्पित करने की मनाही होती है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप शिवजी की भक्ति नहीं कर सकतीं। आप दूर बैठकर या घर के किसी पवित्र कोने से भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का मानसिक जाप कर सकती हैं। इसके अलावा आप सावन सोमवार की कथा का पाठ भी मन ही मन या किसी अन्य की सहायता से सुन सकती हैं।
व्रत के दौरान पूजा का विकल्प और छूट का विधान
अगर आप सोलह सोमवार का व्रत रख रही हैं और किसी कारणवश उस विशेष सोमवार को पूजा या उद्यापन करने में असमर्थ हैं, तो घबराने की कोई जरूरत नहीं है। धर्मशास्त्रों में इसके लिए स्पष्ट समाधान दिया गया है। आप किसी अन्य परिवार के सदस्य (जैसे पति, माता या भाई) से अपने निमित्त संकल्प करवाकर शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करवा सकती हैं। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए भाव और श्रद्धा सबसे ज्यादा मायने रखती है। भगवान शिव भक्तों के भाव को देखते हैं, इसलिए अशुद्धि के इन दिनों में मानसिक रूप से शिव आराधना करना पूरी तरह फलदायी माना गया है।