सिर्फ ब्रेक-टायर नहीं, अब फ्लाइट की तरह हर ट्रिप से पहले अनिवार्य हो बसों का फुल सेफ्टी चेक

उत्तर प्रदेश के अति-व्यस्त और तेज रफ्तार यमुना एक्सप्रेसवे पर हाल ही में हुए भीषण बस हादसे ने एक बार फिर देश की परिवहन व्यवस्था और लंबी दूरी की यात्री सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है। इस दर्दनाक सड़क दुर्घटना के बाद सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों, परिवहन विश्लेषकों और ऑटोमोटिव इंजीनियरों ने सरकार और बस ऑपरेटरों के सामने एक क्रांतिकारी मांग रखी है। विशेषज्ञों का यह साफ तौर पर कहना है कि जब तक विमानों (फ्लाइट्स) की तर्ज पर हर सिंगल ट्रिप यानी सफर से पहले बसों का तकनीकी और सुरक्षा निरीक्षण (Pre-Departure Safety Check) अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के खौफनाक हादसों पर पूरी तरह रोक लगा पाना असंभव है। यमुना एक्सप्रेसवे जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर पर रात के वक्त स्लीपर बसों के बेकाबू होने और तकनीकी खराबी के चलते होने वाली मौतों के बाद से यह मांग अब जोर पकड़ती जा रही है कि कमर्शियल पैसेंजर ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी एविएशन जैसी सख्त और शून्य-सहिष्णुता वाली सुरक्षा संस्कृति को लागू किया जाए।
यमुना एक्सप्रेसवे पर रात के सन्नाटे में जब स्लीपर और एसी बसें फर्राटा भरती हैं, तब जरा सी तकनीकी चूक या ड्राइवर की एक सेकंड की झपकी यात्रियों के लिए मौत का परवाना बन जाती है। हालिया हादसे की प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि बस में कुछ तकनीकी कमियां और मेंटेनेंस की भारी अनदेखी थी, जिसे यदि यात्रा शुरू होने से ठीक पहले चेक कर लिया जाता तो शायद इतनी बड़ी अनहोनी को टाला जा सकता था। वर्तमान व्यवस्था में ज्यादातर बस ऑपरेटर लंबी दूरी तय करने के बाद बिना किसी विधिवत मैकेनिकल चेकअप के ही उसी बस को वापस दूसरे रूट पर दौड़ा देते हैं। ड्राइवरों पर लगातार गाड़ी चलाने का दबाव होता है और बसों के टायर्स, ब्रेक पैड्स, स्टीयरिंग मैकेनिज्म, वायरिंग और आपातकालीन निकास द्वारों की नियमित जांच करने का कोई प्रभावी या पारदर्शी तंत्र टोल प्लाजा या बस डिपोज पर मौजूद नहीं है। इसी लापरवाही के चलते आए दिन एक्सप्रेसवे खून से लाल हो रहे हैं और मासूम यात्री अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं।
विमानों की तर्ज पर 'प्री-डिपार्चर चेकलिस्ट' लागू करने की सख्त जरूरत
ऑटोमोबाइल और रोड सेफ्टी एक्सपर्ट्स का यह तर्क है कि जिस तरह हर कर्मशियल फ्लाइट उड़ान भरने से पहले ग्राउंड इंजीनियरों और पायलटों द्वारा एक लंबी 'सेफ्टी चेकलिस्ट' से गुजरती है और हर छोटे-बड़े पुर्जे की जांच होती है, वही नियम अब लंबी दूरी की स्लीपर और वोल्वो बसों पर भी लागू होना चाहिए। इस नई व्यवस्था के तहत हर बस के रवाना होने से पहले एक अधिकृत मैकेनिक द्वारा टायर्स के एयर प्रेशर, ब्रेक ऑयल, फॉग लाइट्स, रिफ्लेक्टर, स्पीड गवर्नर की कार्यप्रणाली, और फायर फाइटिंग इक्विपमेंट्स की जांच का डिजिटल सर्टिफिकेट या लॉगबुक भरी जानी चाहिए। इसके बिना बस को टर्मिनल या डिपो से बाहर निकलने की अनुमति ही नहीं दी जानी चाहिए। यदि परिवहन विभाग टोल प्लाजा स्तर पर ही इस प्रकार की रैंडम या अनिवार्य डिजिटल चेकिंग की व्यवस्था कर दे, तो सड़क पर दौड़ने वाले आधे से ज्यादा अनफिट वाहन अपने आप बाहर हो जाएंगे।
बस ऑपरेटरों की जवाबदेही और परिवहन विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
इस भीषण हादसे के बाद राज्य सरकार और आरटीओ (RTO) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारों का कहना है कि कागजी खानापूर्ति और जुर्माने वसूलने की पुरानी परंपरा से अब काम नहीं चलने वाला है। बस मालिकों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बेड़े में शामिल हर वाहन पूरी तरह से रोड-वर्थी (सड़क पर चलने योग्य) हो। इसके साथ ही, ड्राइवरों के लिए अनिवार्य रूप से वर्किंग आवर्स (Working Hours) तय किए जाने चाहिए ताकि वे लगातार 8-10 घंटे गाड़ी चलाने के बजाय पर्याप्त आराम पा सकें। यमुना एक्सप्रेसवे जैसे आधुनिक हाईवे पर इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) के साथ-साथ अब बस टर्मिनलों पर ही सुरक्षा जांच के कड़े मानक स्थापित करने का समय आ गया है। आम जनता के जीवन से खिलवाड़ करने वाले लापरवाह ऑपरेटरों के लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द किए जाने चाहिए और जब तक 'फ्लाइट जैसी सेफ्टी चेक' की यह व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक एक्सप्रेसवे पर हादसों का यह सिलसिला थमता नजर नहीं आएगा।