हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने के मामलों में कमी, मध्य प्रदेश पहले स्थान पर… ICAR की रिपोर्ट में खुलासा

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 20 नवंबर, 2025 को उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाओं पर एक बुलेटिन जारी किया है। इस बुलेटिन में इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं की जानकारी दी गई है। इस वर्ष स्थिति काफ़ी बदली हुई नज़र आ रही है। जहाँ पंजाब को कभी पराली प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था, वहीं 2025 में मध्य प्रदेश ने यह ज़िम्मेदारी संभाल ली है। देश भर में पराली जलाने की कुल घटनाएँ 23,608 तक पहुँच गई हैं, जिनमें मध्य प्रदेश का योगदान सबसे ज़्यादा है।2025 में अब तक पराली जलाने की कुल 23,608 घटनाएँ दर्ज की गई हैं। मध्य प्रदेश अब सबसे ज़्यादा पराली जलाने वाला राज्य बन गया है। पराली जलाने के कुल मामलों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 46% है। पंजाब में, यह प्रतिशत 2020 की तुलना में काफ़ी कम होकर सिर्फ़ 21% रह गया है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान की कुल हिस्सेदारी 30% है, जो पराली जलाने के केंद्र के पश्चिमी भारत से मध्य भारत की ओर स्थानांतरित होने का संकेत है। हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है।2025 में किन राज्यों में कितनी आग लगने की घटनाएं होंगी?आग की घटनाओं में राज्य का हिस्सामध्य प्रदेश 45.70%पंजाब 21.40%उत्तर प्रदेश 19.10%राजस्थान 11.30%हरियाणा 2.50%2020 से 2025 तक राज्यवार रुझानपिछले पाँच वर्षों में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है, जो 82,147 से घटकर मात्र 5,046 रह गई है। हैप्पी सीडर और सुपर एसएमएस जैसी मशीनों के व्यापक उपयोग को इस गिरावट का मुख्य कारण बताया जा रहा है। इसमें सख्त सरकारी निगरानी और वैकल्पिक पराली के बढ़ते उपयोग शामिल हैं। पंजाब के कुछ इलाकों में धान की खेती में आई गिरावट ने इसमें अहम भूमिका निभाई है, जिसमें 2024 और 2025 के बीच 50% की गिरावट दर्ज की गई है।हरियाणा में लगातार सुधार हो रहा है। 2020 में 3,884 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2025 में घटकर सिर्फ़ 592 रह गए, यानी 85% की कमी। यह एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ 2020 के बाद किसी भी साल पराली जलाने की घटनाओं में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पराली जलाने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। 2022 में 1,905 घटनाओं से बढ़कर 2025 में 4,507 हो जाने की संभावना है। इस वृद्धि का संभावित कारण धान की कटाई में देरी को माना जा रहा है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की बुवाई में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, आधुनिक मशीनों की कमी को भी एक कारण बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यहाँ के किसान वैकल्पिक प्रबंधन पर कम ध्यान दे रहे हैं। इससे यह भी आशंका बढ़ रही है कि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश पराली प्रदूषण का एक नया केंद्र बन सकता है।राजस्थान में यह खतरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जहां पराली जलाने की घटनाएं 2021 में 1,068 से बढ़कर 2025 में 2,663 हो गई हैं। इसका कारण मशीनरी की कम उपलब्धता और न्यूनतम नीतिगत हस्तक्षेप है।मध्य प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में तेज़ी से उतार-चढ़ाव हो रहा है, लेकिन ख़तरा बना हुआ है। मध्य प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में 6,000 से 13,000 के बीच उतार-चढ़ाव आया है। 2025 में, राज्य में पराली जलाने की 10,800 घटनाएँ दर्ज की गईं, जिससे यह पूरे उत्तर भारत में पराली जलाने में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया। रिपोर्ट में इसके संभावित कारणों का भी ज़िक्र है। हालाँकि फ़सलों के पैटर्न अलग-अलग हैं, कुछ ज़िलों में पराली जलाना जारी है, लेकिन राज्य स्तर पर कोई सख़्त नियंत्रण नहीं है।यदि इसे नहीं रोका गया तो स्थिति और खराब हो जाएगी।उत्तर भारत में पराली जलाने की स्थिति तेज़ी से बदल रही है। पंजाब और हरियाणा में जहाँ सकारात्मक प्रगति हो रही है, वहीं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में स्थिति बिगड़ती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन राज्यों ने बेहतर मशीनरी, वैकल्पिक पराली प्रबंधन और सख्त नियम-कानून लागू नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में वायु प्रदूषण का संकट और भी गहरा सकता है।