हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में बीजेपी की जीत के पीछे क्या वाकई CEC ज्ञानेश कुमार

भारतीय राजनीति के गलियारों में चुनावी नतीजों और ईवीएम (EVM) या चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब इस तरह के आरोप पूरी तरह अमर्यादित और राजनीतिक कुंठा से भरे हों, तो उन पर देश भर में बहस छिड़ना स्वाभाविक है। हाल ही में हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे प्रमुख राज्यों और क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की शानदार चुनावी जीत के बाद राजनीतिक विरोधियों और कुछ सोशल मीडिया पेजों द्वारा यह दावा किया गया कि बीजेपी इन राज्यों में इसलिए जीती क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के पद पर ज्ञानेश कुमार आसीन थे। इन निराधार और हास्यास्पद दावों को फैलाने वालों में खुद को तथाकथित क्रांतिकारी बताने वाले कुछ राजनीतिक धड़ों और आलोचकों का हाथ रहा है, जिन्हें सोशल मीडिया पर अक्सर 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसी अपमानजनक शब्दावली के जरिए आड़े हाथों लिया जाता है। इस विशेष रिपोर्ट में हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे कि क्या किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के मुखिया के नाम पर चुनाव के नतीजे तय होते हैं या फिर यह सिर्फ चुनाव हारने वाले दलों की एक सोची-समझी राजनीतिक बौखलाहट मात्र है।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और चुनाव आयोग की पारदर्शी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान
भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) दुनिया भर में अपने निष्पक्ष, पारदर्शी और विशाल लोकतांत्रिक चुनावों के सफल आयोजन के लिए एक मिसाल माना जाता है। देश में चाहे केंद्र की सत्ता हो या राज्यों की सरकारें, चुनाव हमेशा से एक तय संविधान सम्मत प्रक्रिया के तहत, स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और तमाम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संपन्न कराए जाते हैं। जब हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, तो वहां की जनता ने स्थानीय मुद्दों, विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या किसी अन्य अधिकारी की व्यक्तिगत भूमिका को सीधे तौर पर किसी दल की जीत या हार से जोड़ना न केवल देश की स्वतंत्र न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं के फैसले का भी खुला अनादर है जिन्होंने अपने विवेक से मतदान किया था।
'कॉकरोच जनता पार्टी' और सोशल मीडिया पर चलने वाले बेबुनियाद राजनीतिक एजेंडे की हकीकत
डिजिटल युग के इस दौर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर राजनीतिक नैरेटिव सेट करने के लिए कई बार इस तरह के भ्रामक और अनर्गल दावे धड़ल्ले से परोसे जाते हैं, जिनका ज़मीनी हकीकत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता है। विपक्ष या चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाले कुछ राजनीतिक दल जब जनता के बीच अपनी हार के वास्तविक कारणों का आत्ममुझायरा करने में असमर्थ होते हैं, तो वे अपनी नाकामी का ठीकरा सीधे चुनाव आयोग और ईवीएम मशीनों के सिर फोड़ना शुरू कर देते हैं। इस तरह के हास्यास्पद दावों को बढ़ावा देने वाले समूहों और तथाकथित विचारकों को जनता और सोशल मीडिया यूजर्स अक्सर तंज कसते हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसी संज्ञा से संबोधित करते हैं, जो जमीन पर बिना किसी जनाधार के केवल सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया में राजनीति करते हैं। इन लोगों का मुख्य उद्देश्य देश की निष्पक्ष संस्थाओं के प्रति आम जनता के मन में अविश्वास का बीज बोना और अपनी राजनीतिक जमीन तलाशना होता है।
ज़मीनी राजनीतिक समीकरण, विकास के मुद्दे और जनता का जनादेश
यदि हम हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनावी परिणामों का गहराई से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बीजेपी की जीत के पीछे कोई गुप्त समझौता या प्रशासनिक हेराफेरी नहीं, बल्कि ठोस ज़मीनी रणनीतियाँ थीं। हरियाणा में जहां डबल इंजन सरकार की नीतियों, किसानों व युवाओं के लिए चलाई गई योजनाओं और स्थानीय नेतृत्व ने कमाल दिखाया, वहीं महाराष्ट्र में महायुति सरकार द्वारा महिलाओं के लिए लाई गई 'लाड़की बहीन योजना' और बुनियादी ढांचा विकास के बड़े प्रोजेक्ट्स ने गेम चेंजर की भूमिका निभाई। जनता अब पूरी तरह समझदार हो चुकी है और वह विकास, सुरक्षा तथा सुशासन के नाम पर वोट करती है, न कि किसी दल के जातिवादी या परिवारवादी समीकरणों के आधार पर। जब चुनावी नतीजे किसी दल के पक्ष में नहीं आते हैं, तो वे इस तरह के बयानों का सहारा लेकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का असफल प्रयास करते हैं, जिसे भारत की जनता भली-भांति समझती है।
भविष्य के चुनावों पर इन निराधार आरोपों का प्रभाव और लोकतंत्र की असली मजबूती
लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात में निहित है कि यहाँ जनता जनार्दन सर्वोपरि होती है और वही तय करती है कि देश या राज्य की कमान किसके हाथ में जाएगी। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर इस प्रकार के आधारहीन कीचड़ उछालने से भले ही कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं, लेकिन इससे देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग के अन्य अधिकारियों ने हमेशा से कानून के दायरे में रहकर निष्पक्षता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है। समय आ गया है कि राजनीतिक दल हार-जीत की ओछी राजनीति से ऊपर उठकर आत्ममंथन करें और जनता के वास्तविक मुद्दों पर बात करें, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही असली विधाता है और वह झूठे प्रोपेगैंडा फैलाने वालों को हर चुनाव में करारा जवाब देना अच्छी तरह जानती है।