होर्मुज स्ट्रेट में ईरान की टोल वसूली के खिलाफ ग्लोबल गोलबंदी

वैश्विक समुद्री व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील रास्ते होर्मुज स्ट्रेट में अपनी धाक जमाने और वहां से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर भारी-भरकम टैक्स या टोल वसूलने की ईरान की कोशिशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करारा झटका लगा है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाले इस प्रमुख जलमार्ग में व्यापारिक जहाजों की बेरोक-टोक आवाजाही पर मनमाना शुल्क वसूलने की तेहरान की योजना का पूरी दुनिया में कड़ा विरोध शुरू हो गया है। यूरोपीय संघ के नेतृत्व में एक मजबूत वैश्विक घोषणापत्र तैयार किया गया है, जिसके समर्थन में 60 से अधिक देशों ने खुलकर यह साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल किसी भी देश द्वारा कमाई के साधन या राजनीतिक दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं करने दिया जाएगा। इस अंतरराष्ट्रीय मोर्चेबंदी में अमेरिका और यूरोपीय देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन, कनाडा और सिंगापुर जैसे तमाम बड़े व्यापारिक देश शामिल हो चुके हैं। इन सभी राष्ट्रों ने 'नो फीस, नो टोल' (No Fees, No Tolls) के स्पष्ट संकल्प का समर्थन करते हुए यह दोहराया है कि खुले समुद्र में नेविगेशन की पूर्ण स्वतंत्रता हर देश का अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मौलिक अधिकार है।
क्या है होर्मुज स्ट्रेट का पूरा संकट और क्यों गरमाया यह भू-राजनीतिक विवाद
अंतरराष्ट्रीय समुद्री गलियारों के इतिहास में होर्मुज जलडमरूमध्य का स्थान हमेशा से बेहद संवेदनशील और रणनीतिक रहा है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा बाजार, विशेषकर कच्चे तेल (Crude Oil) और प्राकृतिक गैस (LNG) की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति की रीढ़ माना जाता है। हालिया महीनों में मध्य पूर्व में बढ़े सैन्य तनाव, क्षेत्रीय संघर्ष और अमेरिका-इजरायल के साथ चल रहे कड़े गतिरोध के बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस मार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक पोतों पर अपना सख्त नियंत्रण और अधिकार होने का दावा किया था। ईरान की तरफ से यह मांग रखी गई थी कि ओमान के तट से लगने वाले रास्तों सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय जहाजों को इस मार्ग के प्रयोग के बदले भारी सेवा शुल्क या टोल का भुगतान करना होगा। तेहरान का तर्क था कि चूंकि वह इस जलमार्ग की सुरक्षा, नौवहन प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं का जिम्मा संभाल रहा है, इसलिए उसे यह टैक्स वसूलने का अधिकार है। हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का खुला उल्लंघन और अवैध जबरन वसूली करार दिया था।
60 देशों के इस नए संयुक्त संकल्प के दूरगामी कूटनीतिक और आर्थिक परिणाम
यूरोपीय संघ की उच्च प्रतिनिधि और विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास के माध्यम से घोषित इस वैश्विक पहल ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नया और निर्णायक मोड़ ला दिया है। इस साझा घोषणापत्र में यह बात बहुत स्पष्ट रूप से कही गई है कि किसी भी राष्ट्र द्वारा थोपे गए गैर-कानूनी शुल्क, मनमाने टोल, भेदभावपूर्ण प्रतिबंध, पूर्व-मंजूरी की अड़चनें या नेविगेशन में बाधा उत्पन्न करने वाली किसी भी एकतरफा कार्रवाई का वैश्विक स्तर पर कड़ा प्रतिवाद किया जाएगा। पहले जहां अमेरिका-ईरान तनाव के कारण इस रास्ते से गुजरने वाले तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की जा रही थी और रोजाना गुजरने वाले जहाजों का संचालन प्रभावित हो रहा था, वहीं अब इस वैश्विक प्रस्ताव से वैश्विक शिपिंग उद्योग, समुद्री बीमा कंपनियों और व्यापारिक घरानों को बड़ी राहत मिली है। यदि ईरान एकतरफा रूप से टोल या शुल्क लागू करने में सफल हो जाता, तो पूरी दुनिया में लॉजिस्टिक्स लागत, मालभाड़ा, बीमा प्रीमियम और ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगतीं। 60 देशों की इस सामूहिक नाकामी और विरोध ने ईरान पर आर्थिक और राजनयिक मोर्चे पर दबाव कई गुना बढ़ा दिया है, जिससे उसे अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
भारत और प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस रणनीतिक घटनाक्रम के मायने
भारत के दृष्टिकोण से होर्मुज जलडमरूमध्य की पूर्ण सुरक्षा और वहां निर्बाध व मुक्त आवाजाही होना देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कुल आवश्यकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों से आयात करता है, जो इसी अहम जलमार्ग के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचता है। यदि होर्मुज में ईरान द्वारा कोई भी अतिरिक्त शुल्क या मनमाना टोल लागू कर दिया जाता, तो इसका सीधा और घातक असर भारत के आयात बिल पर पड़ता, जिससे देश के भीतर पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और घरेलू रसोई गैस की कीमतें बढ़ने का भारी जोखिम पैदा हो जाता। भारत के अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान और जापान जैसे एशियाई महाद्वीप के अन्य बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश भी इसी जलमार्ग के सुरक्षित संचालन पर पूरी तरह निर्भर हैं। दुनिया के 60 ताकतवर देशों के इस एकजुट मोर्चे ने यह सुनिश्चित करने का काम किया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियम और समझौते बरकरार रहें और किसी भी एक देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था की इस अहम जीवन रेखा पर जबरन कब्जा जमाने या मनमानी करने का मौका न मिल सके।