12 सितंबर को नई दिल्ली में 57वीं जीएसटी काउंसिल बैठक: करीब एक साल बाद बड़े टैक्स सुधारों पर मंथन

देश के 1.68 करोड़ से अधिक पंजीकृत कारोबारियों और आम करदाताओं के लिए 12 सितंबर का दिन बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में नई दिल्ली में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) काउंसिल की 57वीं बैठक आयोजित होने जा रही है। काउंसिल सचिवालय द्वारा जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, 12 सितंबर की मुख्य बैठक से ठीक एक दिन पहले 11 सितंबर को वरिष्ठ टैक्स अधिकारियों और राज्य प्रतिनिधियों की उच्चस्तरीय समिति बैठक का एजेंडा अंतिम रूप देगी।
करीब एक साल के अंतराल के बाद बुलाई गई यह बैठक भारतीय व्यापार जगत के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है। इससे पहले सितंबर 2025 में हुई 56वीं बैठक में टैक्स दरों और स्लैब के युक्तिकरण (Rationalisation) पर बड़े फैसले लिए गए थे। इस बार केंद्र और राज्यों का मुख्य फोकस कारोबारियों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) को अनलॉक करने, कानूनी मुकदमों को कम करने और कंप्लायंस को आयकर रिटर्न (ITR) की तरह सरल व पारदर्शी बनाने पर केंद्रित होगा।
इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के नियमों में बड़ी राहत: धारा 17(5) के प्रतिबंधों पर समीक्षा
व्यापारियों और उद्योग जगत की सबसे पुरानी और प्रमुख मांग इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के नियमों को लचीला बनाने की रही है। सीजीएसटी कानून की धारा 17(5) के तहत फिलहाल कई तरह की वस्तुओं और सेवाओं पर चुकाए गए टैक्स का क्रेडिट क्लेम करने पर रोक (Blocked Credit) है। उद्योग प्रतिनिधियों की शिकायत रही है कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किए गए वास्तविक खर्चों पर भी टैक्स फंस जाता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है।
12 सितंबर की बैठक में काउंसिल निम्नलिखित मदों पर ब्लॉक्ड आईटीसी के नियमों में ढील देने पर गंभीरता से विचार कर सकती है:
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कर्मचारियों के लिए वाहन खरीद: कंपनी के नाम पर कर्मचारियों के आधिकारिक आवागमन के लिए खरीदे जाने वाले कमर्शियल व पैसेंजर वाहनों पर आईटीसी की अनुमति।
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हेल्थ व लाइफ इंश्योरेंस: कर्मचारियों के कल्याण के लिए कंपनियों द्वारा ली जाने वाली ग्रुप हेल्थ और टर्म लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों के प्रीमियम पर टैक्स क्रेडिट।
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अचल संपत्ति और निर्माण कार्य: व्यावसायिक उपयोग के लिए बनाई जाने वाली इमारतों, गोदामों और वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर आईटीसी को तर्कसंगत बनाना, जैसा कि हालिया अदालती फैसलों में भी रेखांकित किया गया है।
सप्लायर के टैक्स न भरने पर खरीदार का आईटीसी नहीं फंसेगा: प्रस्तावित नया सुरक्षा नियम
जीएसटी प्रणाली में ईमानदार खरीदारों के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी यह रही है कि यदि माल बेचने वाले विक्रेता (Supplier) ने सरकार के पास जीएसटी जमा नहीं किया, तो टैक्स विभाग खरीदार का आईटीसी ब्लॉक या रिवर्स कर देता था। खरीदार के पास सप्लायर की टैक्स फाइलिंग को ट्रैक करने का कोई सीधा साधन न होने के कारण यह प्रावधान भारी विवाद और मुकदमों का कारण बन रहा था।
काउंसिल की आगामी बैठक में एक विशेष सुरक्षा तंत्र (Safe Harbour Provision) लाने का प्रस्ताव है। इसके तहत, यदि खरीदार बैंक स्टेटमेंट, ई-वे बिल, टैक्स इनवॉइस और डिजिटल पेमेंट रिकॉर्ड के जरिए यह प्रमाणित कर देता है कि उसने जीएसटी सहित पूरी रकम का भुगतान बैंकिंग माध्यम से सप्लायर को कर दिया था, तो खरीदार का आईटीसी नहीं काटा जाएगा। यह कदम लाखों एमएसएमई और मध्यम उद्यमों को बड़ी कानूनी राहत देगा।
इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और अनयूटिलाइज्ड रिफंड पर अटकी वर्किंग कैपिटल होगी मुक्त
कई विनिर्माण क्षेत्रों (Manufacturing Sectors) में 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' की गंभीर समस्या बनी हुई है। इसका अर्थ यह है कि कच्चे माल और इनपुट सेवाओं पर ऊंची दर से टैक्स लगता है, जबकि तैयार उत्पाद (Finished Goods) पर कम दर से जीएसटी वसूला जाता है। इसके चलते कंपनियों के पास करोड़ों रुपये का अनयूटिलाइज्ड आईटीसी क्रेडिट लेजर में फंसा रह जाता है।
बैठक में लंबित रिफंड क्लेम को स्वचालित (Automated) और समयबद्ध तरीके से निपटाने के लिए नए दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं:
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इनपुट सेवाओं पर रिफंड: इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर में केवल इनपुट गुड्स ही नहीं, बल्कि इनपुट सर्विसेज के अनुपात पर भी रिफंड देने की अनुमति पर विचार हो सकता है।
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इंटर-स्टेट अनयूटिलाइज्ड क्रेडिट ट्रांसफर: एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना इस्तेमाल हुए टैक्स क्रेडिट को बिना लंबी औपचारिकताओं के ट्रांसफर और रिफंड करने की सुगम व्यवस्था बनाई जा सकती है।
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समयबद्ध रिफंड वितरण: रिफंड दावों के ऑडिट और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर 30 से 45 दिनों के भीतर बैंक खातों में सीधे राशि ट्रांसफर करने की तैयारी है।
छोटे कारोबारियों के लिए मल्टी-स्टेट रजिस्ट्रेशन और कॉर्पोरेट गारंटी पर स्पष्टता
डिजिटल अर्थव्यवस्था और अंतरराज्यीय ई-कॉमर्स के विस्तार को देखते हुए छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए रजिस्ट्रेशन नियमों में बदलाव की तैयारी है:
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मल्टीपल स्टेट सिंगल विंडो रजिस्ट्रेशन: कई राज्यों में सप्लाई करने वाले छोटे कारोबारियों को हर राज्य में अलग-अलग भारी कंप्लायंस करने के बजाय एक एकीकृत मल्टी-स्टेट रजिस्ट्रेशन ढांचा उपलब्ध कराया जा सकता है।
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मंथली टैक्स क्रेडिट पास करने वालों के लिए राहत: हर महीने ₹2.5 लाख से अधिक का टैक्स क्रेडिट आगे बढ़ाने वाले पंजीकृत व्यापारियों के लिए सत्यापन और केवाईसी की प्रक्रिया को आसान बनाया जाएगा।
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कॉर्पोरेट गारंटी विवाद का हल: एक ही ग्रुप की सहायक कंपनियों (Subsidiaries) को दी जाने वाली पैरेंट कॉर्पोरेट गारंटी के मूल्यांकन और उस पर जीएसटी लगाने के नियमों में स्पष्टता लाकर बेवजह के टैक्स नोटिस पर लगाम लगाई जाएगी।
मोबाइल फोन पर 18% टैक्स घटने के संकेत: आम उपभोक्ताओं को मिल सकती है राहत
बैठक में केवल प्रक्रियात्मक सुधार ही नहीं, बल्कि चुनिंदा इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की टैक्स दरों की समीक्षा भी एजेंडे का हिस्सा बन सकती है। पिछले एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर मेमोरी चिप्स की कीमतों में भारी उछाल के चलते स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक हैंडसेट्स की खुदरा कीमतें 15% से 20% तक बढ़ गई हैं, जिसका सीधा असर घरेलू बिक्री और मांग पर पड़ा है।
मोबाइल फोन और उनके महत्वपूर्ण पार्ट्स पर वर्तमान 18% जीएसटी की दर को घटाने या तर्कसंगत बनाने की मांग उठ रही है। यदि काउंसिल इस पर सहमति जताती है, तो त्योहारी सीजन से पहले स्मार्टफोन बाजार में नई जान आ सकती है और आम खरीदारों को हैंडसेट्स सस्ते दामों में उपलब्ध हो सकेंगे।
जीएसटी अपीलेट ट्रिब्यूनल (GSTAT) और विवाद समाधान व्यवस्था की समीक्षा
टैक्सपेयर्स को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगाने से बचाने के लिए गठित किए जा रहे जीएसटी अपीलेट ट्रिब्यूनल (GSTAT) के संचालन की प्रगति रिपोर्ट भी बैठक में पेश की जाएगी। ट्रिब्यूनल की राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय पीठों के तेजी से शुरू होने से वर्षों से लंबित टैक्स अपीलों और विवादों का निपटारा स्थानीय स्तर पर ही तेजी से हो सकेगा।
देश में जीएसटी संग्रह का मजबूत आधार (जुलाई में ₹2.11 लाख करोड़ से अधिक का ग्रॉस कलेक्शन) सरकार को साहसिक टैक्स सुधार करने का वित्तीय हौसला दे रहा है। ऐसे में 12 सितंबर की यह बैठक 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को नई ऊंचाई देने और देश के औद्योगिक विकास को तेज गति प्रदान करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।