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2030 से गाड़ियां खुद लगाएंगी इमरजेंसी ब्रेक: भारत में नई कारों के लिए अनिवार्य होगा AEBS सिस्टम, जानें कैसे रुकेगा हादसा

भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और सड़क सुरक्षा के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव की रूपरेखा तैयार हो चुकी है। देश की सड़कों पर होने वाले भीषण सड़क हादसों और उनमें जाने वाली लाखों जानों को बचाने के लिए केंद्र सरकार अब गाड़ियों को 'स्मार्ट और प्रोएक्टिव' बनाने की सबसे बड़ी योजना पर काम कर रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के प्रस्तावित नए रोडमैप के अनुसार, वर्ष 2030 से भारत में बिकने वाली सभी नई कारों और पैसेंजर वाहनों में ऑटोनॉमस इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (AEBS) को अनिवार्य (Mandatory) किया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कभी चालक की आंख झपकी, ध्यान भटका या अचानक सामने कोई बाधा आई, तो कार चालक के एक्शन का इंतजार किए बिना खुद-ब-खुद इमरजेंसी ब्रेक लगाकर गाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही रोक देगी। भारत NCAP 2.0 के कड़े क्रैश टेस्ट नियमों के बाद यह फैसला भारतीय ऑटो बाजार को वैश्विक सुरक्षा मानकों के समकक्ष खड़ा करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।

AEBS क्या है और यह जीवन रक्षक तकनीक कैसे काम करती है?

ऑटोनॉमस इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (AEBS) आधुनिक एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) का सबसे अहम और संवेदनशील हिस्सा है। यह प्रणाली कार के फ्रंट ग्रिल, विंडशील्ड और बंपर में लगे हाई-डेफिनिशन कैमरों, मिलीमीटर-वेव रडार (LiDAR/Radar) और जटिल कंप्यूटर एल्गोरिदम के तालमेल पर काम करती है।

गाड़ी के चलते समय यह सेंसर नेटवर्क सड़क पर आगे चल रहे वाहनों, अचानक सामने आए पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और किसी भी अन्य अवरोध की दूरी और सापेक्ष गति को मिलीसेकंड्स में मापता रहता है। इस तकनीक की कार्यप्रणाली मुख्य रूप से तीन चरणों में पूरी होती है:

  1. खतरे की पहचान और अलर्ट (Forward Collision Warning): जैसे ही सिस्टम को लगता है कि आगे चल रहे वाहन से दूरी तेजी से घट रही है और टक्कर की आशंका है, यह तुरंत डिजिटल क्लस्टर में लाल चेतावनी लाइट और तेज बीप (ऑडियो-विजुअल अलर्ट) बजाकर ड्राइवर को सचेत करता है।

  2. ड्राइवर की प्रतिक्रिया की निगरानी: यदि अलर्ट के बावजूद चालक ब्रेक नहीं दबाता या पर्याप्त दबाव नहीं बनाता, तो सिस्टम ब्रेक असिस्ट को सक्रिय करके ब्रेकिंग पावर बढ़ा देता है।

  3. ऑटोनॉमस इमरजेंसी ब्रेकिंग: अंतिम क्षणों में अगर ड्राइवर पूरी तरह निष्क्रिय रहता है और भिड़ंत तय दिखती है, तो ऑन-बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ECU) कार के ब्रेक पर पूरा नियंत्रण ले लेता है और अधिकतम दबाव के साथ इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है, जिससे या तो गाड़ी पूरी तरह रुक जाती है या फिर टक्कर की गति इतनी कम हो जाती है कि जानलेवा चोट का खतरा नगण्य हो जाए।

2030 की समयसीमा क्यों तय की गई? ऑटो इंडस्ट्री की तैयारी

सरकार ने इस नियम को अचानक लागू करने के बजाय 2030 की डेडलाइन इसलिए तय की है, ताकि घरेलू ऑटोमोबाइल निर्माताओं और कंपोनेंट सप्लायर्स को अपनी टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन को तैयार करने का पर्याप्त समय मिल सके। वर्तमान में महिंद्रा, टाटा मोटर्स, हुंडई और किआ जैसी कंपनियों की केवल प्रीमियम या टॉप-वेरिएंट गाड़ियों (जैसे XUV700, हैरियर, सफारी, क्रेटा या सेल्टोस) में ही लेवल-2 ADAS के तहत ऑटोमैटिक ब्रेकिंग की सुविधा मिलती है।

बजट और एंट्री-लेवल सेगमेंट (जैसे 5 से 8 लाख रुपये की हैचबैक) में फिलहाल इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं होता। सरकार का लक्ष्य है कि अगले चार से पांच वर्षों में रडार और कैमरा सेंसर्स का बड़े पैमाने पर भारत में ही स्थानीय उत्पादन (Localization) शुरू हो जाए। स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से इन सेंसर्स की लागत में भारी गिरावट आएगी, जिससे 2030 तक मारुति ऑल्टो या वैगनआर जैसी बेसिक कारों में भी AEBS देना आर्थिक रूप से व्यावहारिक हो जाएगा।

भारतीय सड़कों पर क्यों सबसे ज्यादा जरूरी है ऑटोमैटिक ब्रेकिंग?

सड़क परिवहन मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 4.5 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें 1.5 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा देते हैं। इनमें से करीब 65 से 70 फीसदी हादसे सीधे तौर पर तेज रफ्तार, मानवीय लापरवाही, ओवरटेकिंग के दौरान गलत फैसले या ड्राइवर को नींद की झपकी आने की वजह से होते हैं।

हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सबसे ज्यादा जानलेवा हादसे रियर-एंड कोलिजन (पीछे से टक्कर) के रूप में होते हैं, जहां आगे चल रहे ट्रक या गाड़ी के अचानक ब्रेक लगाने पर पीछे आ रही कार 100 किमी/घंटा की रफ्तार से उसमें समा जाती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि सभी कारों में AEBS अनिवार्य हो जाता है, तो रियर-एंड कोलिजन के मामलों में 40 से 50 फीसदी तक की सीधी कमी आ सकती है। इसके अलावा, रात के अंधेरे या कोहरे में भी रडार सेंसर इंसानी आंखों से पहले खतरे को भांप लेते हैं, जिससे सर्दियों के मौसम में होने वाले दर्जनों गाड़ियों के आपस में टकराने के हादसों पर पूरी तरह लगाम लगेगी।

क्या बढ़ जाएंगी कारों की कीमतें? जेब पर कितना पड़ेगा असर

जब भी कोई नई सुरक्षा तकनीक अनिवार्य की जाती है, तो ग्राहकों के मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि क्या अब कार खरीदना और महंगा हो जाएगा? वर्तमान में अगर किसी कार में अलग से ADAS पैकेज जोड़ा जाता है, तो उसकी एक्स-शोरूम कीमत में लगभग ₹50,000 से ₹80,000 तक की बढ़ोतरी देखी जाती है।

हालांकि, ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2030 तक स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। जैसे-जैसे सेमीकंडक्टर और रडार सेंसर्स का निर्माण देश के भीतर बड़े पैमाने पर होगा, इकोनोमीज ऑफ स्केल (बल्क प्रोडक्शन) के चलते इस सिस्टम की लागत घटकर महज ₹15,000 से ₹25,000 के दायरे में आ जाएगी। इसके अलावा, सुरक्षित गाड़ियों की वजह से एक्सीडेंट क्लेम घटेंगे, जिसका सीधा फायदा वाहन चालकों को कार इंश्योरेंस के कम प्रीमियम (Third-Party & Comprehensive Premium) के रूप में मिलेगा। कुल मिलाकर, थोड़ी सी अतिरिक्त लागत के बदले सड़क पर जिंदगी की गारंटी का यह सौदा हर लिहाज से आम जनता के हित में साबित होगा।

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