2200 KM का सफर, बुर्के में छिपाया चेहरा और अजनबियों का इंटरनेट: फिर भी पुलिस के चक्रव्यूह में ऐसे फंसी श्रद्धा दुबे

अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले अक्सर यह मान बैठते हैं कि अगर वे अपने मोबाइल फोन का सिम कार्ड फेंक दें, वेशभूषा बदल लें और सैकड़ों मील दूर किसी अनजान शहर में जा छिपें, तो कानून के लंबे हाथ उन तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे। लेकिन डिजिटल तकनीक, साइबर फॉरेंसिक और जमीनी मुखबिर तंत्र के इस आधुनिक दौर में अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी बरत ले, कोई न कोई डिजिटल फुटप्रिंट पीछे छूट ही जाता है। श्रद्धा दुबे का मामला भी कुछ ऐसा ही है, जिसने पुलिस और जांच एजेंसियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए फिल्मी पटकथा जैसा जाल बुना था। करीब 2200 किलोमीटर का थका देने वाला सफर, पहचान छिपाने के लिए बुर्के का सहारा और सर्विलांस से बचने के लिए राह चलते अजनबियों के हॉटस्पॉट व मोबाइल का इस्तेमाल करने के बावजूद वह पुलिस के बिछाए तकनीकी चक्रव्यूह को भेद नहीं सकी और आखिरकार सलाखों के पीछे पहुंच गई।
बुर्का, फर्जी पहचान और 2200 किलोमीटर की फरारी
घटना को अंजाम देने के बाद जब पुलिस की तफ्तीश तेज हुई, तो श्रद्धा को अच्छी तरह अहसास था कि उसका नाम और चेहरा जांच एजेंसियों के रडार पर आ चुका है। गिरफ्तारी के खौफ से उसने शहर छोड़ने की योजना बनाई और पहचान को पूरी तरह छिपाने के लिए बुर्का पहनना शुरू कर दिया। सफर के दौरान उसने सार्वजनिक बसों, सामान्य ट्रेनों और लोकल टैक्सियों का सहारा लिया ताकि रिजर्वेशन चार्ट या आधिकारिक पहचान पत्रों में उसका नाम दर्ज न हो सके। एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमाओं को पार करते हुए उसने लगभग 2200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की। रास्ते में वह ऐसे भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सस्ते लॉज में रुकी जहां सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कम होती है या जहां बिना पुख्ता आईडी कार्ड के ठहरने की जगह मिल जाती थी। उसने चेहरे पर हर वक्त नकाब ओढ़े रखा ताकि कोई भी स्थानीय व्यक्ति या गश्ती पुलिसकर्मी उसकी असली शिनाख्त न कर सके।
सर्विलांस से बचने का शातिर पैंतरा: अपना फोन बंद, अजनबियों से मांगा वाई-फाई
श्रद्धा दुबे जानती थी कि आज के दौर में पुलिस किसी भी आरोपी तक पहुंचने के लिए सबसे पहले उसके मोबाइल नंबर की सीडीआर (Call Detail Record) और आईएमईआई (IMEI) नंबर को ट्रैक करती है। इसलिए उसने फरारी के पहले दिन ही अपने निजी सिम कार्ड को तोड़कर फेंक दिया और अपना स्मार्टफोन पूरी तरह बंद कर दिया। लेकिन बाहर छिपने के दौरान उसे अपने करीबियों, मददगारों और केस से जुड़ी कानूनी अपडेट्स जानने के लिए इंटरनेट की सख्त जरूरत थी। इसके लिए उसने एक बेहद शातिर तरीका निकाला। वह रेलवे स्टेशनों, बस स्टॉप या चाय-नाश्ते की दुकानों पर खड़े अनजान यात्रियों और आम लोगों से बेहद मासूमियत के साथ मदद मांगती थी। वह कभी परिजनों से बात करने तो कभी अर्जेंट काम का बहाना बनाकर उनके मोबाइल फोन से हॉटस्पॉट मांगती थी या कुछ मिनटों के लिए उनका इंटरनेट इस्तेमाल करती थी। इंटरनेट से कनेक्ट होते ही वह केवल एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स या सोशल मीडिया के अस्थायी हैंडल्स के जरिए अपने संपर्कों से बात करती और तुरंत चैट हिस्ट्री डिलीट कर देती थी।
साइबर टीम की पैनी नजर: एक डिजिटल सुराग ने खोला पूरा राज
श्रद्धा का यह पैंतरा कुछ दिनों तक तो काम आया, लेकिन साइबर सेल और स्पेशल टास्क फोर्स की टीमें लगातार 'पैटर्न एनालिसिस' पर काम कर रही थीं। पुलिस को भनक थी कि आरोपी पूरी तरह ऑफलाइन नहीं रह सकती और किसी न किसी जरिए से अपने नेटवर्क से संपर्क साधने की कोशिश जरूर करेगी। तकनीकी विशेषज्ञों ने उसके पुराने सोशल मीडिया प्रोफाइल्स, क्लाउड बैकअप्स और करीबी संपर्कों के खातों पर डिजिटल ट्रैप बिछा रखा था। जैसे ही श्रद्धा ने एक अनजान व्यक्ति के वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट होकर अपने एक पुराने सुरक्षित अकाउंट में कुछ सेकंड के लिए लॉगिन किया, सर्वर पर एक अलर्ट जनरेट हो गया। साइबर टीम ने तुरंत उस आईपी एड्रेस (IP Address) और उससे जुड़े मोबाइल टावर की लोकेशन को पिनपॉइंट कर लिया। हालांकि वह इंटरनेट सेशन महज कुछ मिनटों का था, लेकिन पुलिस को वह इलाका और शहर समझ आ चुका था जहां वह उस वक्त मौजूद थी।
घेराबंदी और गिरफ्तारी: कानून के शिकंजे में टूटी चालाकी
सटीक लोकेशन और इलाके का दायरा स्पष्ट होते ही स्थानीय पुलिस और सर्विलांस टीम ने उस क्षेत्र में सादे कपड़ों में गश्त बढ़ा दी। मुखबिरों को अलर्ट किया गया और हाल ही में सक्रिय हुए उस नेटवर्क के आसपास के सभी सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले गए। फुटेज में एक संदिग्ध महिला बुर्के में लगातार अपना सिर झुकाए और अजनबियों से फोन मांगते हुए दिखाई दी। कद-काठी, चलने के अंदाज और हाथ के निशान के मिलान के बाद पुलिस का शक यकीन में बदल गया। पुलिस टीम ने बिना कोई मौका दिए उस लॉज और इलाके की घेराबंदी कर ली जहां वह ठहरी हुई थी। जब महिला पुलिसकर्मियों ने उसे घेरकर बुर्का हटाने को कहा, तो उसके होश उड़ गए। 2200 किलोमीटर का सफर तय करके खुद को शातिर समझने वाली श्रद्धा दुबे की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई। पूछताछ में उसने कुबूल किया कि उसने पुलिस से बचने के लिए हर संभव कोशिश की थी, लेकिन कानून की वैज्ञानिक और तकनीकी जांच के आगे उसकी कोई चाल सफल नहीं हो सकी।