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नोबेल प्राइज पर भड़के डोनाल्ड ट्रंप, होरमुज का नाम बदलकर दुनिया को दी खुली चुनौती

News India Live, Digital Desk : अपनी बेबाकी और अतरंगी फैसलों के लिए मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस बार उनके निशाने पर दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ (Nobel Peace Prize) है। ट्रंप ने एक विवादास्पद बयान देते हुए कहा है कि अगर उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलता, तो फिर यह सम्मान किसी और को भी नहीं मिलना चाहिए। इतना ही नहीं, अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होरमुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) का नाम बदलने का भी ऐलान कर दिया है।नोबेल कमेटी पर बरसे ट्रंप: ‘मेरे जैसा शांतिदूत कोई नहीं’ट्रंप का मानना है कि उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध रुकवाए हैं और ऐतिहासिक समझौते कराए हैं, इसके बावजूद नोबेल कमेटी उन्हें नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने अपने संबोधन में तंज कसते हुए कहा, “मैंने जो काम किए हैं, उसके लिए मुझे कई बार नोबेल मिलना चाहिए था। अगर वे मुझे यह सम्मान नहीं दे सकते, तो इस पुरस्कार की कोई साख नहीं रह जाती।” ट्रंप के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या नोबेल जैसे पुरस्कार अब राजनीति का शिकार हो रहे हैं?’होरमुज’ अब हुआ पुराना, अब चलेगा ‘ट्रंप’ का नाम!सिर्फ पुरस्कारों तक ही नहीं, ट्रंप ने भूगोल बदलने की भी ठान ली है। उन्होंने आधिकारिक तौर पर संकेत दिया है कि दुनिया के सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग ‘होरमुज जलडमरूमध्य’ का नाम बदलकर ‘स्ट्रेस ऑफ ट्रंप’ (Strait of Trump) कर दिया जाए। ट्रंप का तर्क है कि इस समुद्री रास्ते की सुरक्षा में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा हाथ है, इसलिए इसका नाम भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। उनके इस दावे ने ईरान और ओमान जैसे खाड़ी देशों के बीच खलबली मचा दी है, क्योंकि यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा माना जाता है।क्या ये सिर्फ चुनावी स्टंट है या महाशक्ति का अहंकार?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के ये बयान उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा हैं, जहाँ वे दिखाना चाहते हैं कि दुनिया की हर बड़ी चीज पर अमेरिका का ही वर्चस्व होना चाहिए। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग का नाम बदलना इतना आसान नहीं है और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की मंजूरी अनिवार्य है। लेकिन ट्रंप के इस तेवर ने यह साफ कर दिया है कि वे अपनी साख और पहचान के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अब देखना यह है कि दुनिया उनके इस ‘नामकरण’ वाले फैसले को कितनी गंभीरता से लेती है।

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