धर्म

Adi Shankaracharya Jayanti 2026: सनातन धर्म के पुनरुद्धार शंकराचार्य, जानें क्यों और कहाँ स्थापित किए थे उन्होंने 4 दिव्य मठ

News India Live, Digital Desk: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस वर्ष 21 अप्रैल 2026 को सनातन धर्म के महान प्रहरी, अद्वैत वेदांत के प्रणेता और विलक्षण दार्शनिक आदि शंकराचार्य की जयंती मनाई जाएगी। मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो आध्यात्मिक साम्राज्य खड़ा किया, वह आज हजारों वर्षों बाद भी अडिग है। आइए जानते हैं उस महामानव की गाथा, जिन्होंने बिखरते भारत को भक्ति और ज्ञान के एक सूत्र में पिरोया।कौन थे आदि शंकराचार्य? असाधारण बुद्धि और संन्यास का संकल्प8वीं शताब्दी में केरल के ‘कालड़ी’ नामक छोटे से गांव में शिवगुरु और माता आर्याम्बा के घर एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम शंकर रखा गया। बाल्यकाल से ही उनकी बुद्धि इतनी प्रखर थी कि मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्होंने चारों वेदों का कंठस्थ ज्ञान प्राप्त कर लिया था। जब समाज अंधविश्वास और धार्मिक भ्रम में फंसा था, तब नन्हे शंकर ने संन्यास का कठिन मार्ग चुना और ज्ञान की खोज में निकल पड़े। उन्होंने देश के कोने-कोने में भ्रमण कर शास्त्रार्थ किया और वैदिक धर्म की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया।क्यों पड़ी 4 मठों की स्थापना की जरूरत?आदि शंकराचार्य के काल में सनातन धर्म कठिन चुनौतियों से गुजर रहा था। वेदों की शिक्षाएं विलुप्त हो रही थीं और अलग-अलग मतों के बीच भारी टकराव था। ऐसे समय में धर्म को एक संगठनात्मक ढांचा देने और शास्त्रार्थ की परंपरा को जीवित रखने के लिए उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार शक्तिपीठों (मठों) की स्थापना की। इन मठों का उद्देश्य केवल धार्मिक शिक्षा देना नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत को एक सांस्कृतिक इकाई बनाना था।सनातन धर्म के चार आधार स्तंभ: जानें इन मठों का महत्वमठ का नामस्थान (राज्य)दिशासंबद्ध वेदमहावाक्यशृंगेरी शारदा पीठचिकमंगलूर (कर्नाटक)दक्षिणयजुर्वेदअहं ब्रह्मास्मिगोवर्धन मठपुरी (ओडिशा)पूर्वऋग्वेदप्रज्ञानं ब्रह्मशारदा/द्वारका मठद्वारका (गुजरात)पश्चिमसामवेदतत्त्वमसिज्योतिर्मठबद्रिकाश्रम (उत्तराखंड)उत्तरअथर्ववेदअयमात्मा ब्रह्म1. दक्षिण: शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक)तुंगा नदी के तट पर स्थित यह मठ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पहला मठ माना जाता है। यहाँ के संन्यासी अपने नाम के अंत में ‘सरस्वती’, ‘भारती’ या ‘पुरी’ विशेषण लगाते हैं। इसके प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वर थे।2. पूर्व: गोवर्धन मठ (ओडिशा)जगन्नाथ पुरी स्थित यह मठ उड़ीसा से लेकर बिहार तक के क्षेत्र का धार्मिक नेतृत्व करता है। इस मठ के संन्यासी नाम के आगे ‘आरण्य’ लगाते हैं। यहाँ के प्रथम मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रिय शिष्य पद्मपाद थे।3. पश्चिम: शारदा मठ (गुजरात)द्वारका नगरी में स्थित इस मठ को ‘द्वारका पीठ’ भी कहा जाता है। सामवेद की परंपरा को संजोए इस मठ के संन्यासी ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ संप्रदाय नाम से पहचाने जाते हैं। हस्तामलक यहाँ के पहले मठाधीश बने।4. उत्तर: ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)हिमालय की गोद में बद्रिकाश्रम के समीप स्थित यह मठ ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र है। यहाँ से दीक्षित संन्यासी अपने नाम के पीछे ‘गिरि’, ‘पर्वत’ या ‘सागर’ लगाते हैं। आचार्य तोटक इसके पहले उत्तराधिकारी थे।

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