मनोरंजन

बाबरी विध्वंस के दिन अयोध्या में क्या हुआ था? संजय दत्त की आखिरी सवाल ने छेड़ी नई बहस, दिखेगा RSS का इतिहास

News India Live, Digital Desk: बॉलीवुड के ‘बाबा’ यानी संजय दत्त एक बार फिर बड़े पर्दे पर धमाका करने को तैयार हैं, लेकिन इस बार मामला मनोरंजन से कहीं आगे बढ़कर इतिहास के पन्नों को खंगालने का है। उनकी आगामी फिल्म ‘आखिरी सवाल’ इस साल की सबसे विवादित और चर्चित फिल्म बनकर उभरी है। फिल्म का नया प्रोमो रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर सवालों का सैलाब आ गया है। प्रोमो एक चुभता हुआ सवाल पूछता है “6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में आखिर क्या हुआ था?”इतिहास के ‘अनकहे’ पन्नों से उठेगा पर्दा’आखिरी सवाल’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के इतिहास और उससे जुड़े बड़े विवादों का एक कच्चा चिट्ठा नजर आ रही है। फिल्म के टीजर में 1934 में महात्मा गांधी और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की ऐतिहासिक मुलाकात को दिखाया गया था। अब मेकर्स ने उन सवालों को हवा दी है, जिनसे देश की राजनीति दशकों तक गरमाती रही है। फिल्म में इन ज्वलंत मुद्दों पर फोकस किया गया है:क्या आरएसएस महात्मा गांधी की हत्या के पीछे था?बाबरी मस्जिद विध्वंस में संघ की वास्तविक भूमिका क्या थी?आपातकाल (Emergency) के दौरान पर्दे के पीछे क्या सच छिपा था?संजय दत्त का सोशल मीडिया पोस्ट: ‘सच्चाई का सामना करने का वक्त’खुद संजय दत्त ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए फिल्म की गंभीरता को स्पष्ट किया है। उन्होंने संकेत दिया कि यह फिल्म उन तथ्यों को सामने लाएगी, जिन्हें या तो दबा दिया गया या फिर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। संजय दत्त का यह नया अवतार उनके फैंस के लिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि वह एक ऐसी भूमिका में हैं जो इतिहास के सबसे कठिन सवालों का सामना कर रही है।समीरा रेड्डी की ‘अनकम्फर्टेबल’ वापसीइस फिल्म के जरिए एक्ट्रेस समीरा रेड्डी भी लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं। अपनी वापसी पर बेबाकी से बात करते हुए समीरा ने कहा, “मैंने वापसी के लिए कोई ‘सेफ’ रास्ता नहीं चुना है। ‘आखिरी सवाल’ आपको सहज महसूस कराने वाली फिल्म बिल्कुल नहीं है।” उन्होंने कुबूल किया कि आरएसएस को लेकर उनकी जानकारी पहले बहुत सीमित थी, लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद उनका नजरिया बदल गया। समीरा के अनुसार, यह फिल्म उन धारणाओं को चुनौती देगी जो लोग दशकों से पाले बैठे हैं।प्रोमो ने बढ़ाई धड़कनें, सेंसर बोर्ड पर रहेगी नजर6 दिसंबर 1992 की घटना पर केंद्रित प्रोमो ने राजनीतिक गलियारों में भी सुगबुगाहट तेज कर दी है। फिल्म के संवाद और उठाए गए सवाल इतने सीधे हैं कि इनका असर बॉक्स ऑफिस के साथ-साथ जनमानस पर पड़ना तय है। अब सबकी नजरें सेंसर बोर्ड और फिल्म की रिलीज डेट पर टिकी हैं, क्योंकि ऐसे संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्में अक्सर विवादों के घेरे में रहती हैं।

Back to top button