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Overthinking Side Effects: ख्यालों के ताने-बाने बुन्ने की आदत कहीं छीन न ले आपकी सेहत, वक्त रहते ऐसे पहचानें खतरे के संकेत

Overthinking Side Effects: ख्यालों के ताने-बाने बुन्ने की आदत कहीं छीन न ले आपकी सेहत, वक्त रहते ऐसे पहचानें खतरे के संकेत

आज की भागदौड़ भरी और कॉम्पिटिटिव जिंदगी में किसी बात को लेकर सोचना बहुत सामान्य है। लेकिन जब यही सोचना जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह 'ओवरथिंकिंग' (Overthinking) का रूप ले लेता है। बहुत से लोग बात-बात पर गहराई से सोचने को अपनी आदत मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें लगता है कि वे सिर्फ सतर्क रह रहे हैं। लेकिन असलियत यह है कि हर छोटी-मोटी बात को दिमाग में बार-बार घुमाते रहना आपके मानसिक संतुलन और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए एक धीमे जहर की तरह काम करता है।

जब दिमाग लगातार एक्टिव रहता है, तो शरीर को कभी पूरी तरह से आराम नहीं मिल पाता। यह आदत धीरे-धीरे आपके आत्मविश्वास को खा जाती है और आपको हर समय एक अनजाने डर और चिंता में डुबोए रखती है।

फोकस और फैसले लेने की ताकत हो जाती है कमजोर

जब आप एक ही बात को बार-बार सोचते हैं, तो आपका दिमाग पूरी तरह से थक जाता है। इस मानसिक थकान का सीधा असर आपकी रोजमर्रा की कार्यक्षमता पर पड़ता है।

  • निर्णय लेने में असमर्थता: व्यक्ति छोटी-छोटी चीजों में इतना उलझ जाता है कि वह सही समय पर सही फैसले नहीं ले पाता।

  • रिश्तों पर असर: काम में मन न लगना, हर समय चिड़चिड़ापन रहना और खुद को दूसरों से अलग कर लेना— धीरे-धीरे आपकी दिनचर्या और आपके अपनों के साथ रिश्तों को भी खराब करने लगता है।

ज्यादा सोचने से कौन-सी बीमारियां घेर सकती हैं?

दिल्ली के जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजेश कुमार बताते हैं कि ओवरथिंकिंग कोई मामूली समस्या नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों की जड़ है। जब आप लगातार सोचते हैं, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो हमारे अंगों को नुकसान पहुँचाता है।

आइए नीचे दी गई तालिका से समझते हैं कि ज्यादा सोचने से हमारे शरीर और दिमाग पर क्या असर पड़ता है:

इस 'सोचने की बीमारी' से खुद को कैसे बचाएं?

अच्छी बात यह है कि ओवरथिंकिंग कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे ठीक न किया जा सके। अपनी लाइफस्टाइल में कुछ छोटे और जरूरी बदलाव करके आप इस चक्र को तोड़ सकते हैं:

  • दिमाग को व्यस्त रखें: जब भी आपको लगे कि आप खाली बैठकर पुरानी बातों को सोच रहे हैं, तुरंत अपनी पसंद का कोई काम शुरू कर दें— जैसे संगीत सुनना, किताब पढ़ना या कोई इनडोर गेम खेलना।

  • नियमित कसरत और योग: हर दिन कम से कम 20 से 30 मिनट एक्सरसाइज या वॉक करें। योग और मेडिटेशन (ध्यान) करने से दिमाग की नसें शांत होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है।

  • समाधान पर ध्यान दें, समस्या पर नहीं: किसी भी बात को लेकर 'ऐसा क्यों हुआ' सोचने के बजाय 'अब आगे क्या किया जा सकता है' यानी सॉल्यूशन ढूंढने पर अपना फोकस शिफ्ट करें।

  • मन की बात शेयर करें: अकेले घुटने से बेहतर है कि आप अपने दोस्तों या परिवार के किसी भरोसेमंद सदस्य से बैठकर बात करें। कई बार बातें शेयर करने से ही मन का बोझ आधा हो जाता है।

डॉक्टर या थेरेपिस्ट से कब मिलना जरूरी है?

 कब लें विशेषज्ञ की मदद?

अगर आपको महसूस होने लगे कि ज्यादा सोचने की यह आदत अब आपके कंट्रोल से बाहर हो चुकी है और इसका सीधा असर आपकी नौकरी, बिजनेस या पारिवारिक जिंदगी पर पड़ रहा है, तो इसे बिल्कुल न छिपाएं। अगर लगातार घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना, कई दिनों तक नींद न आना या मन में लगातार उदासी बनी रहे, तो तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर या काउंसलर से संपर्क करें। सही समय पर की गई काउंसलिंग और थेरेपी से आप इस समस्या से पूरी तरह बाहर आ सकते हैं।

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